अजब सिंह भाटी, ग्रेटर नोएडा : विधानसभा चुनाव के पहले चरण के मतदान के लिए सर्द हवाओं के बीच राजनीतिक गलियारे में सरगर्मी काफी तेज हो गई है। सभी दलों ने अपने प्रत्याशियों की घोषणा कर दी है। अधिकांश उम्मीदवार पार्टी के वोट बैंक के सहारे अपनी नइया पार लगाने के गठजोड़ में लगे हैं। भावी प्रत्याशियों ने हाथों में जात-धर्म की पतवार ले रखी है। वहीं बात यदि 1970-80 दशक के दौरान हुए विधानसभा चुनाव की करें तो पार्टी के साथ प्रत्याशी के खुद की छवि भी निर्णायक भूमिका में हुआ करती थी। लोग अपने प्रत्याशियों को जिताने के लिए बैलगाड़ियों में बैठकर देशभक्ति के गीत गाते हुए गांवों में प्रचार-प्रसार किया करते थे, लेकिन धीरे-धीरे प्रचार के तौर तरीकों में खासा बदलाव आया है। ग्रेटर नोएडा वेस्ट के पतवाड़ी गांव निवासी मेहरचंद यादव (85) बताते हैं कि देश जब आजाद हुआ उस समय उनकी उम्र महज 10 या 11 साल रही होगी। आजादी के बाद 50 के दशक में लोकसभा व 70 के दशक में विधानसभा का पहली बार चुनाव हुआ था। चुनाव की घोषणा होते ही पहली बार मतदान कैसे किया जाना था, कैसे वोट डाला जाना है, इसके बारे में बताया जाता था। गांव की चौपाल पर शाम को चुनाव को लेकर चर्चा हुआ करती थी। चुनाव प्रचार में पार्टियों की टोली देशभक्ति के गीत गाते हुए गांव-गांव घूमती थी और लोगों से लोकतंत्र की रक्षा के लिए मतदान करने की अपील करती थी। उसके बाद ही अपने-अपने दल के प्रत्याशी को मतदान करने की अपील की जाती थी। पहली बार होने वाले चुनाव में लोकतंत्र को जिदा रखने और आगे बढ़ने का नारा दिया गया था। इसी नारे के साथ सभी दल वोट मांगते थे। आजादी के दीवाने रह चुके ज्यादातर लोग चुनाव तो नहीं लड़ रहे थे, लेकिन चुनाव प्रचार में बढ़ चढ़कर हिस्सा जरूर लेते थे। वहीं ग्रामीण हरकरण ने बताया कि अब और पहले के चुनावों में जमीन आसमान का अंतर है। पहले जहां सादगी व अच्छी छवि के प्रत्याशी तलाश किए जाते थे, वहीं अब धन व बाहुबल प्रत्याशी के चयन का पैमाना बन गए हैं।

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