मुजफ्फरनगर: मौलाना कुमैल असगर गाजीपुरी ने फरमाया कि इस्लाम लोगों पर रहम करने की हिदायत देता है। उन्होंने कहा कि इमाम हुसैन ने करबला के मैदान में विपरीत हालात में भी सब्र और इंसानियत का परिचय देकर लोगों को जीने के सही तरीके के बारे में बताया।

किदवईनगर स्थित जाहिद हाल पर मुहर्रम की पहली मजलिस को खिताब फरमाते हुए मौलाना कुमैल असगर गाजीपुरी ने कहा कि इस्लाम में नमाज को दर्जा-ए-अव्वल पर रखा गया है। मौलाना ने फरमाया कि दीन-ए-इस्लाम मानने वालों को हिदायत की गई है कि वे अपने अेमल में रहम और हक का ध्यान रखें। कमजोर पर रहम करें और अमल में किसी के भी साथ नाइंसाफी पेश नहीं आनी चाहिए। उन्होंने कहा कि इस्लाम में जो हिदायत पेश की गईं हैं, उनको सिर्फ मुसलमान पर ही नहीं बल्कि गैर मुस्लिमों के मामले में भी अमल में लाना लाजमी है। उन्होंने समझाया कि अगर कोई मुसलमान नहीं है तो इसका मतलब नहीं कि आप उन पर रहम न करो और इंसाफ से पेश न आओ। मौलाना ने कहा कि इस्लाम सब के साथ बराबरी के सुलूक का हुक्म देता है। दुनिया जहां में जितने भी इंसान हैं, वह एक ही खुदा की मखलूक हैं। इसलिए किसी भी कोने पर इंसान का खून बहे तो वह खुदा को नागवार गुजरता है। दीन के मानने वालों का फर्ज है कि वे वो काम करे जिससे खुदा राजी होता हो। उन्होंने नवासाए रसूल हजरत इमाम हुसैन व उनके जांनिसारों द्वारा मैदान-ए-करबला में पेश कुर्बानियों का जिक्र किया। कहा कि इमाम हुसैन की कुर्बानियों के बूते ही उनके नाना का दीन फिर से ¨जदा हो गया। मजलिस में मौजूदा लोगों से मौलाना कुमैल असगर ने दरख्वास्त की कि वे अपने बच्चों की परवरिश अच्छा इल्म और तहजीब देकर करें। उन्होंने कहा कि इल्म एक ऐसी दौलत है जिसका न तो खोने का डर है और न ही किसी के लूटने का। उन्होंने कहा कि ¨जदगी और आखिरत के लिए इल्म जरूरी है। इल्म से ¨जदगी के साथ आखिरत भी संवरती है। इससे पूर्व मर्सियाख्वानी से मजलिस की शुरुआत हुई। बानिये मजिलस स्व. विरासत हुसैन का परिवार रहा। दूसरी ओर केवलपुरी स्थित इमामबारगाह बशीर हुसैन में हुई मजलिस को मौलाना सै. मजहरुल हसन जैदी ने खिताब किया। मुतवल्ली बाबर जैदी, मुस्तजाब हुसैन, कुमैल अब्बास आदि शामिल रहे।

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