मुरादाबाद : बात चाहें देश के दुश्मनों से लोहा लेने की हो या फिर दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में सरहद की निगहबानी की। त्याग व बलिदान के जज्बे से ओतप्रोत हमारे जवान दायित्व निर्वाह में कभी पीछे नहीं रहे। ऐसी ही विषम व प्रतिकूल प्राकृतिक परिस्थिति में मुरादाबाद की नवीं वाहिनी पीएसी ने हिमराज हिमालय के मस्तक पर साहस व बलिदान से जो गौरवगाथा लिखी, वह युवाओं के लिए आज भी प्रेरणास्रोत है। 

गौरवशाली अतीत समेटे है नवीं वाहिनी पीएसी

मुरादाबाद में हरिद्वार रोड पर स्थित नवीं वाहिनी पीएसी का परिसर अपने भीतर गौरवशाली अतीत समेटे है। यकीन न हो, तो एक बार नवीं वाहिनी पीएसी को करीब से देखने व समझने की कोशिश करें। अतीत की चादर में लिपटी त्याग व बलिदान से भरी दो सौ से भी अधिक कुर्बानी पर्दे के पीछे की तस्वीर सामने ला देगी। नवीं वाहिनी पीएसी की स्थापना देश की आजादी के तत्काल बाद चार अक्टूबर 1947 को की गई। तब इसे एसपीएफ के रूप में जाना जाता था। नवीं वाहिनी पीएसी के कंधे पर चीन से लगी सरहद की निगहबानी का भार था। प्राकृतिक रूप से परिस्थिति विपरीत होने के बावजूद एसपीएफ जवान दायित्व निर्वाह में चूके नहीं। 

केदारनाथ व बद्रीनाथ की पहाडिय़ों पर चढ़कर की सीमा की रखवाली

बर्फ से ढकी केदारनाथ व बद्रीनाथ की पहाडिय़ों पर चढ़कर वह सीमा की रखवाली करते रहे। तब के प्राकृतिक हालात आज से जुदा ही नहीं बल्कि मानव जीवन के लिए खतरनाक भी थे। शून्य डिग्री सेल्सियस से भी कम तापमान पर दायित्व का निर्वाह करने वाले एसपीएफ के जवानों ने कभी भी अपने जान की परवाह नहीं की। यही वजह रही कि एसपीएफ के 203 जवान हिमालय में चिर निद्रा में सो गए। ऐसे कर्मयोगियों को याद करने के लिए नवीं वाहिनी पीएसी ने परिसर में शहीद स्मारक की स्थापना की है। उस पर शहीदों के नाम दर्ज हैं। 

हर साल श्रद्धा के साथ झुकते हैं शीश 

इनकी शहादत के सम्मान में हर वर्ष सैकड़ों शीश श्रद्धा के साथ झुकते हैं। त्याग व बलिदान के प्रतिमूर्ति इन शहीदों को दीपोत्सव के मौके पर याद करने का नैतिक दायित्व हमारे कंधे पर इसलिए भी है, क्योंकि इन्होंने हमें चैन की नींद सोने का अवसर दिया है। 

 

Posted By: Narendra Kumar

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