मुरादाबाद, जेएनएन। शहरों में जब रोजगार का जरिया बंद हुआ तो बेबसी में गांव की ओर कदम चलने लगे। रास्ते में सभी बंदिशों को तोड़कर केवल घर पहुंचने की जल्दी थी। लॉकडाउन की घोषणा के बाद जैसे ही फैक्ट्रियों और कारखानों के चक्के जाम हुए वैसे ही श्रमिकों ने घर की ओर कदम बढ़ाना शुरू कर दिया था। गांव में तो श्रमिक पहुंच गए हैं,लेकिन अब भविष्य को लेकर चिंता भी सताने लगी है। जो हुनर बीते वर्षो में सीखा आखिर उसका उपयोग वह कहां करेंगे? यह सवाल श्रमिकों को दिन-रात सोने भी नहीं दे रहा है।

शहर से लगभग 22 किमी की दूरी पर मुरादाबाद ब्लाक का गोट गांव स्थित है। यहां के लगभग सौ से सवा सौ लोग दूसरे राज्यों में काम करते थे। लॉकडाउन में हिमाचल,कर्नाटक,दिल्ली,हरियाणा के साथ ही अन्य दूसरे राज्यों से श्रमिक वापस अपने घर आ गए हैं। दैनिक जागरण ने गांव में पहुंचकर श्रमिकों से उनको मिल रहे लाभ के बारे में जानकारी मांगी। जिस पर श्रमिकों ने बताया कि बहुत ही मुश्किल से उन्होंने घर का रास्ता तय किया है। राशन की दुकानों से कम-ज्यादा राशन तो मिल रहा है लेकिन, घर का खर्च केवल राशन से नहीं चल सकता है। श्रमिकों की मांग है कि उन्हें अगर गांव और उनके शहरों में ही काम दिलाया जाएगा तो शायद वह दूसरे शहरों की तरफ नहीं जाएंगे।

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मोबाइल बेचकर दिया किराया,मांगने पर भी पानी नहीं मिला

गोट गांव निवासी सुमित ने बताया कि वह बीते एक साल से बिहार के दरभंगा जनपद में मजदूरी का काम करता था। लॉकडाउन के बाद वह कुछ दिन तक तो रुका रहा,लेकिन जब खाने-पीने की दिक्कत हुई तो इस दौरान वह पैदल की घर की ओर निकल पड़ा। रास्ते में चल रहे वाहनों से वह किसी तरह घर पहुंचा। घर आने तक उसे एक ट्रक ड्राइवर को फोन तक बेचना पड़ा। इस दौरान जब वह पैदल घर आ रहा तो रास्ते में लोग पानी मांगने पर नहीं दे रहे थे। भूखे रहकर करीब दस दिनों में वह दरभंगा से गांव के घर तक पहुंच पाया।

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बोले श्रमिक-

फरीदाबाद की फैक्ट्री में काम करता था। लॉकडाउन में घर तो आ गया हूं,लेकिन अब काम की तलाश है। गांव में कोई काम नहीं।

शिवा ठाकुर,श्रमिक

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बेंगलूरू में काम करता था। मुझे यहां पर अभी तक कोई काम नहीं मिला। मनरेगा में भी काम मिल जाएगा तो कर लूंगा।

अक्षय सिंह,श्रमिक

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हिमाचल में रहकर मजदूरी करता था,लेकिन यहां पर कोई काम नहीं है। ऐसे में परिवार का पेट कैसे भरेगा इस बात की चिंता सता रही है। गांव में रोजगार नहीं है।

रिशीपाल सिंह,श्रमिक

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शाहजहांपुर की फैक्ट्री में काम करता था। लॉकडाउन में फैक्ट्री बंद हो गई थी,तो घर आ गया था, फैक्ट्री खुलेगी तो फिर काम करने जाऊंगा।

दिलशाद,श्रमिक

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बिहार के दरभंगा में मजदूरी करता था। लॉकडाउन में काम नहीं मिला तो बड़ी मुश्किल से घर पहुंच पाया है। अब वापस नहीं जाऊंगा।

सुमित,श्रमिक

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जम्मू-कश्मीर से काम की तलाश में आया था। लेकिन लॉकडाउन में यहीं फंसा हूं। यहां पर कोई काम नहीं है।

मुहम्मद मकबूल बट,श्रमिक

Posted By: Jagran

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