मुरादाबाद :

भले ही तीन तलाक पर सुप्रीमकोर्ट के फैसले पर छह महीने की रोक लग गई हो, लेकिन तलाक का दंश झेल रही महिलाओं ने राहत की सांस ली है। उनका कहना है कि इस प्रक्रिया में सुधार लाने की जरूरत है। साथ ही मर्दो को नसीहत भी जरूरी है।

जनपद में एक दर्जन से अधिक महिलाएं तलाक का दंश झोल रही हैं। शौहर द्वारा दुत्कारने के बाद मां-बाप का भी सहारा नहीं मिला। नतीजतन मेहनत मजदूरी ही उनके बच्चों के भरण-पोषण जरिया बना है। जीविका का साधन न होने पर कारखाने में दिहाड़ी व पड़ौसियों के ताने सुनना पड़ रहे हैं। तंगदस्ती की विभीषिका झेलना पड़ रही है सो अलग।

करूला निवारी बिल्कीस का कहना है सुप्रीमकोर्ट के फैसले से सकून मिला है। पति ने तीन साल पहले तलाक दे दिया था। दो बच्चों का साथ हैं। बर्तन मांझ कर भरण-पोषण करना पड़ रहा है। कटघर पीतल नगरी निवासी शबनम का दर्द भी कुछ ऐसा ही है। तीन साल पहले पति ने तलाक दिया। एक बच्चा है। जिसकी तालीम व भरण पोषण का सहारा बच्चे के नाना-नानी बने हैं। वह कहती है कि तलाक का ये दंश जिंदगीभर दुख देने के लिए काफी है। तलाकशुदा मुर्शरफीन ने अपना दर्द कुछ इस तरह बयान किया। बताती है पांच साल पहले पति ने तलाक देकर घर से बेघर कर दिया था। मां-बाप की मौत होने पर भाई सहारा बने। लेकिन उनकी पत्‍ि‌नयों के तानों ने जख्म को और ताजा कर दिया। अब बच्चों को तालीम दिलाने के लिए दर-दर की ठोकरें खाना पड़ रही हैं। कभी-कभी घर का चूल्हा भी नहीं जलता।

Posted By: Jagran

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