मुरादाबाद : उम्र के अंतिम पड़ाव पर घर से दूर होने का मलाल मन में है। अपनों के होते हुए बेगाने की भांति जीवन यापन करने का दर्द भी दिल में है, पर कोई अपने ही मां-बाप को बेबसी के हाल में छोड़ने वालों की सजा दिलाने की सलाह दे, यह मंजूर नहीं है। ऐसे होते हैं हमारे मां-बाप।

विश्व बुजुर्ग दु‌र्व्यवहार जागरूकता दिवस के मौके पर ऐसे ही वटवृक्षों की तलाश की गई। उनकी वेदना समझने की कोशिश हुई। जीवन के अंतिम वक्त में एक गिलास पानी पाने के लिए जद्दोजहद कर रहे बुजुर्गो के अतीत में झांकने की कोशिश की गई। मुरादाबाद के वैदिक वानप्रस्थ आश्रम में मौजूद बुजुर्गो की दुखती रग पर हाथ रखते ही उनके न सिर्फ उनके मन का गुबार फूटा, बल्कि वह आंखें भी आंसुओं की सैलाब में डूब गई, जिन्होंने दशकों पहले जीवन के अंतिम पड़ाव का सुनहरा सपना देखा था।

केस 1

- रेलवे के सेवानिवृत्त टीटी ओमप्रकाश 14 जून को अपने जन्मदिन की 82वीं सालगिरह मना रहे थे। अफसोस कि वृद्धा आश्रम में मौजूद साथियों के अलावा वहां उनका अपना कोई नहीं था। कुरेदने पर बताया कि मूलरूप से वह बिजनौर के रहने वाले हैं। शहर के मिलिंद बिहार मुहल्ले में कभी उनका भरा पूरा कुनबा अपने घर में निवास करता था। तीस वर्ष पहले पत्‍‌नी की मौत के बाद वह पूरी तरह अकेले हो गए। चारों पुत्रों ने घर बेच कर रुपये का बंटवारा कर लिया। उस निशानी को भी सदा के लिए खत्म कर दिया जिसमें उनकी पत्‍‌नी अपने बच्चों के साथ खिलखिलाती रहती थी। बूढ़ापे में अवसाद के हालात से निजात के लिए उन्होंने वृद्धा आश्रम का चुनाव किया। हालांकि वह खुलकर बोले कि ऐसे जटिल हालात के बाद भी उन्हें किसी से कोई शिकायत नहीं है। अंतिम संस्कार के वक्त बेटे आग दे दें, बस इतनी सी तमन्ना है।

केस 2

- सहारनपुर के मूल निवासी मनोहर लाल भाटिया सेवा निवृत्त लेक्चरर हैं। सम्मान से समझौता करना उन्हें कतई मंजूर नहीं। यही वजह है कि अपने चार पुत्रों के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंकने से भी वह चूके नहीं। इतना ही नहीं खुद पर छाए संकट के बादल के बाद भी वह अपनी जान व पहचान वाले बुजुर्गो का तारणहार बनने को तत्पर रहते हैं। उन्होंने बताया कि चार दशक पहले मुरादाबाद को अपना ठिकाना बनाया। चारों बच्चों की परवरिश की। पत्‍‌नी ने साथ छोड़ा। तब से लेकर आज तक वह सम्मान की लड़ाई लड़ रहे हैं। जिंदगी खुद की शर्तो पर जीना चाहते हैं। उन्होंने बताया कि हरथला रेलवे कालोनी में रहने वाले बुजुर्ग दोस्त से मिलकर आ रहा हूं। वह पेंशन के रूप में 45 हजार रुपये पाता है। फिर भी मानसिक अवसाद में है। परिजन उसका तिरस्कार कर रहे हैं। ऐसे में मदद मांग रहा है। बुजुर्गो की वेदना समझने वाला कोई नहीं। ऐसे में वृद्धा आश्रम ही एक मात्र विकल्प है।

- वृद्धा आश्रम में रहने वाली एक सेवा निवृत्त महिला लेक्चरर ने कहा कि बुजुर्गो के कारण बच्चों का घर टूटे, यह मंजूर नहीं है। कोई मां नहीं चाहती कि उसके वजह से बच्चे परेशान हों। एक ही बेटी है। मुरादाबाद का घर उसे दे दिया। बेटी दिल्ली में रहती है। ऐसे में वृद्धा आश्रम के सिवाय और कोई विकल्प नहीं था। पेंशन से जीवन यापन कर रही हूं। गर्व इस बात का है कि बूढ़ापे में भी सम्मान के साथ जीवन यापन कर रही हूं। किसी पर बोझ बनना ठीक नहीं।

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पेंशन के सरकारी दावे खोखले

वृद्धा आश्रम में मौजूद लोग इस बात के प्रमाण हैं कि हर बुजुर्ग को पेंशन देने का सरकारी दावा पूरी तरह से खोखला है। पैंसठ वर्षीय ओमप्रकाश बताते हैं कि इस जहां में उनका अपना कोई नहीं। जवानी भाई व भतीजों के बीच कटी। उन्होंने अपनी क्षमता के मुताबिक साथ दिया। बूढ़ापे में महसूस हुआ कि अंतिम वक्त में वृद्धाआश्रम ही मुफीद ठिकाना है। इसलिए चला आया। उनका दावा है कि अब तक पेंशन नहीं मिली। काफी प्रयास भी किया। लेकिन सरकारी योजना के लाभ से वंचित हूं। आश्रम में रहने वाले कई बुजुर्ग अब तक पेंशन से वंचित हैं।

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कानून है साथ.. मा-बाप के प्यार और त्याग को भूल कर संतानें उन्हें दर-दर की ठोकरें खाने पर मजबूर कर देती हैं। ऐसे लोगों की नकेल कसने के लिए कानून हैं। इनके तहत कोई भी वृद्ध शिकायत कर सकता है। अपने अधिकार की माग कर सकता है। यह है नियम

- धारा 125 के तहत, कोई भी माता-पिता, जो अपने जीवन-निर्वाह में अक्षम हैं, वे अपने बेटे से भरण-पोषण की माग कर सकते हैं। वर्ष 2007 में देश भर के लिए एक विशेष कानून बनाया गया। यह सिर्फ माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण और कल्याण की दृष्टि से बनाया गया है। यह मेंटीनेंस ऑफ पेरेंट्स एंड सीनियर सिटिजन एक्ट, 2017 के नाम से जाना जाता है। इसके तहत कोई भी वरिष्ठ नागरिक अथवा माता-पिता अपने वयस्क बेटे-बेटी या पोते-पोती से भरण-पोषण की माग कर सकते हैं। निसंतान वरिष्ठ नागरिक अपने उस रिश्तेदार से माग कर सकते हैं, जिसे उनकी संपत्ति में हक मिलना हो। ये आवेदन एक विशेष न्यायाधिकरण में देना होगा, जहा माता-पिता खुद रह रहे हों या जहा उनका बच्चा रह रहा हो। न्यायाधिकरण इसमें मासिक खर्चे एवं भरण-पोषण के प्रावधान का निर्णय देती है।

By Jagran