मुरादाबाद, जेएनएन। रामगंगा नदी के किनारे अपने चार बीघा खेत में तोरई बोने वाले कमल सिंह इन दिनों बेबस हैं। उन्होंने करीब 80 हजार की लागत से इस खेत में तोरई बोई थी। फसल तो तैयार हो गई है लेकिन, अब खरीदार नहीं हैं। मंडी तक वह फसल पहुंचाते हैं तो अपनी जेब से किराया भरना पड़ रहा है। ऊपर से मांग न होने के कारण 1 या 2 रुपये किलो से ज्यादा में तोरई आढ़ती भी नहीं लेगा। ऐसे में इस बार उनके 80 ह•ार और मेहनत बर्बाद हो जाएगी।

कमल सिंह की ही तरह नन्हे सैनी, रामकिशोर और न जाने कितने किसान हैं जिनकी फसल इस बार खेत में ही दम तोड़ देगी। न तो खरीदार फसल खरीदने के लिए तैयार है और ना ही इस फसल को कहीं और बेचा जा सकता है। तमाम किसानों का दर्द यही है कि उन्होंने अपनी गाढ़ी कमाई से जो खेत में एक से डेढ़ लाख रुपया लगाया था, वह अब बर्बाद हो जाएगा। दरअसल, लॉकडाउन के कारण बाहर के राज्यों व जिलों की मंडियों में सप्लाई ठप हो गई है। जो सब्जी है भी वह पूरी तरह से लोकल की मंडी पर ही निर्भर है लेकिन, होटल, रेस्टोरेंट बंद होने के कारण सब्जियों की मांग खत्म हो गई है। ऐसे में आढ़तियों ने भी सब्जी मंगाना बंद कर दिया है और फसल खेत पर ही खत्म हो रही है।

15 से 20 ह•ार रुपये आता है 4 बीघे पर खर्च

किसान नन्हे सैनी का कहना है कि चार बीघे खेत में किसी भी सब्जी को उगाने में 15 से 20 ह•ार का खर्चा आता है। उन्होंने बताया कि तोरई और लौकी की फसल दीपावली के आसपास लगाई जाती है जो मार्च के आसपास तैयार होती है। फिर इस फसल को तुड़वाने के लिए अलग से मजदूरों को लगाना पड़ता है। इस खर्च में सब्जी को मंडी तक पहुंचाने का किराया भी अलग से शामिल होता है। इस बार यह खर्च भी निकालना मुश्किल है।

Posted By: Jagran

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