Rampur Sanskarshala 2022 : रामपुर के सितारा डिग्री कालेज के डायरेक्टर इफ्तेखार हुसैन का कहना है कि आज फोन हमारी जरूरत बन गए हैं। यह विशाल दुनिया इस छोटे से फोन में सिमट गई है। बच्चे इंटरनेट की दुनिया में इतना खो गए हैं कि वास्तविक दुनिया को भूलने लगे हैं।

हंसी-मजाक, सुख-दुख सब इंटरनेट मीडिया पर हो गया

दिन भर फेसबुक, इंस्ट्रग्राम, ट्विटर आदि साइट्स पर फोटो व वीडियो को पोस्ट करना और फिर उस पर मिलने वाले लाइक्स व कमेंट देखकर खुश होना। यदि किसी पोस्ट पर खराब कमेंट मिला तो दुखी हो जाना। हम इस खूबसूरत दुनिया को छोड़कर इंटरनेट की आभासी दुनिया को ही असल समझने लगे हैं।

यह सच है कि इंटरनेट और इंटरनेट नेटवर्किंग साइट्स का विस्तार जहां लोगों को जोड़ रहा है, वहीं संचार की विकसित होती यह नई संस्कृति अपने साथ कई समस्याएं भी ला रही हैं। भारत इसका अपवाद नहीं है, जहां तकनीक का विस्तार तो बहुत तेजी से हो रहा है, पर उसका प्रयोग किस तरह होना है, यह अभी सीखा जाना है।

इंटरनेट मीडिया का सबसे ज्यादा असर बच्चों पर

एक नई चुनौती के साथ इसका सबसे अधिक असर बच्चों पर हो रहा है। अमूमन खेल के मैदान पर होने वाली बच्चों की शरारतें जैसे एक-दूसरे को चिढ़ाना या परेशान करना। यह सब कुछ अब बंद हो चुका है। बच्चों की यह शैतानियां अब इंटरनेट नेटवर्किंग साइट्स के जरिये आभासी दुनिया में नजर आने लगी हैं।

सावधानी ही बचाव है

फेसबुक या अन्य इंटरनेट नेटवर्किंग साइट्स का इस्तेमाल दोधारी तलवार की तरह होता है। यदि सावधानी नहीं बरती जाए तो इससे बच्चों को नुकसान हो सकता है। सावधानी नहीं बरतने से बच्चे अक्सर साइबर बुलिंग का शिकार हो जाते हैं। साइबर बुलिंग से मतलब किसी वयस्क या बच्चे को किसी अन्य बच्चे या वयस्क द्वारा डिजिटल प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल (इंटरनेट या मोबाइल आदि) कर प्रताड़ित या मानसिक रूप से परेशान किए जाने से है।

बच्चे अकेलेपन का हो रहे शिकार

जागरूकता के अभाव में बच्चों को यह पता नहीं होता कि साइबर बुलिंग का शिकार होने पर उन्हें क्या करना चाहिए। नतीजतन वे अकेलेपन और अवसाद का शिकार हो जाते हैं। ऐसे में अभिभावकों की जिम्मेदारी बढ़ जाती है। अभिभावक मानते हैं कि प्रतिस्पर्धी दुनिया में बच्चों को साइबर दुनिया से जोड़ना उनके भविष्य के लिहाज से जरूरी है।

स्कूलों में सिखाया जाए इंटरनेट आधारित व्यवहार

वे बच्चों को इंटरनेट के हवाले कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं, जबकि उन्हें यहां भी सतर्कता बरतने की जरूरत है। व्यापक रूप से देखा जाए तो अब समय आ गया है कि नैतिक शिक्षा के साथ इंटरनेट आधारित व्यवहार और शिष्टाचार को भी स्कूली पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाए, ताकि बच्चों को पता चल सके कि सम्मान और गरिमा के साथ इंटरनेट पर कैसे व्यवहार किया जाना चाहिए।

उनका एक छोटा-सा मजाक दूसरे पर कितना भारी पड़ सकता है। यह सच है कि मोबाइल फोन व इंटरनेट जहां आज जरूरत बन गए हैं, वहीं इनसे अभिभावकों के सामने भी दोहरी मुश्किल खड़ी हुई हैं। क्योंकि न तो बच्चों को पूरी तरह से इनका प्रयोग करने से रोका जा सकता है और न ही पूरी तरह छूट दी जा सकती है। यहां सब एक क्लिक पर सब उपलब्ध है। डिजिटल प्लेटफार्म पर कई ऐसी भी चीजें हैं, जिनकी समय से पहले जानकारी बच्चों के लिए सही नहीं है।

बच्चों के शारीरिक विकास पर बुरा असर

स्क्रीन टाइम बढ़ने से बच्चों के मानसिक व शारीरिक विकास पर बुरा असर पड़ने लगा है। लिहाजा, आज इस पहलू पर गंभीरता से सोच विचार की जरूरत है। आजकल एकल परिवार के चलते बच्चों को माता-पिता का समय नहीं मिल पाता। अपनी व्यस्तता के बीच मां-बाप खुद ही बच्चे को मोबाइल थमा देते हैं। इससे वह आभासी दुनिया को ही अपनी असली दुनिया समझने लगते हैं। साथ ही माता पिता से जुड़ाव भी खत्म होने लगता है।

आज बहुत कम मां-बाप बच्चे की शक्ति, रुचि और योग्यता के अनुरूप उसे प्रेरित करने व वातावरण पैदा करने की कोशिश करते हैं। वह अपनी सुविधा, रुचि व जरूरत के अनुसार उन्हें ढालने का प्रयास करते हैं। प्रेम, प्रोत्साहन, सम्मान व सुरक्षा इन सबकी आवश्यकता बड़ों से ज्यादा बच्चे को है। इसके लिए जरूरी है कि माता-पिता भी बच्चों के साथ समय बिताएं। उनकी उलझनों को सहानुभूतिपूर्वक सुनें और धीरे-धीरे उनकी भावनाओं का विकास करते चलें।

बच्चों को मोबाइल का उतना ही उपयोग करने दें, जितना उसके लिए जरूरी है। बच्चे मोबाइल पर क्या देख रहे हैं, इसकी भी जानकारी माता-पिता को होनी चाहिए। आजकल कुछ ऐसे एप भी आ गए हैं, जिनसे जानकारी मिल जाती है कि बच्चे ने कितनी देर मोबाइल का प्रयोग किया। इसके माध्यम से भी अभिभावक बच्चों पर नजर रख सकते हैं। बच्चों का ज्यादा समय वास्तविक दुनिया में बिताने के लिए प्रेरित करें।

Edited By: Samanvay Pandey