मुरादाबाद (रईस शेख): आधुनिक युग में पराली को भी हाईटेक बनाने की कवायद शुरू की गई है। इसके उपयोग के लिए नए-नए तरीके अपनाए जा रहे हैं। कहीं इसका इस्तेमाल कुट्टी का भूसा बना कर पशुओं का पेट भरने के लिए तो कहीं गरीब परिवारों का आशियाना पराली बनी है। कम्पोस्ट खाद बनाने में पराली लघु एवं सीमात किसान तथा कारोबारियों की जरूरत बनने लगी है। पीतल, स्टील से उत्पादित बर्तनों की पैकिंग में पराली का महत्वपूर्ण योगदान है। यही वजह है पराली की डिमाड बढ़ने लगी हैं। उधर, इसको जलाने से अनेक नुकसान हैं। सबसे बड़ा खतरा पर्यावरण के प्रदूषण का है जो वायुमंडल के लिए खतरनाक है। बढ़ रहा पराली का उत्पादन

ज्यों-ज्यों धान का क्षेत्र बढ़ रहा है त्यों-त्यों पराली उत्पादन भी बढ़ा

है। दो दशक पहले धान की उन्नत प्रजातिया न होने से पराली सिर्फ पशुओं के चारे इस्तेमाल में की जाती थी। गाव के चंद परिवार इसका छप्पर बनाकर अपना आशियाना तैयार कर लिया करते थे। आधुनिक युग में पराली के उत्पादन में सौ गुना बढ़ोतरी होने से उपयोग के भी नए रास्ते खुले हैं। कुट्टी से बनाते हैं भूसा

जाड़े के दिनों में पराली का महत्व और भी बढ़ जाता है। पशुओं को ठंड से बचाकर तरोताजा रखने में इसकी कुट्टी को भूसे के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। बिछावन के तौर पर पराली गरीबों का गर्म व नर्म बिस्तर के रूप में इस्तेमाल की जाती है। छप्पर का आशियाना

पराली एक और काम अनेक। इसकी जरूरत समाज के हरेक वर्ग को है। कारोबारी अपने तौर पर एवं किसान अपने तरीके से इसका इस्तेमाल करते हैं। गरीबों का आशियाना पराली से ही तैयार किया जाता है। पराली न जलाने का लिया संकल्प

पराली जलाने से दूषित हो रहे पर्यावरण की सुरक्षा के लिए ग्रामीणों में जागरूकता आई है। उन्होंने पराली न जलाने का संकल्प लिया है। पक्षियों के लिए हानिकारक

डॉ. नजाकत अली का कहना है कि पराली का प्रदूषण इंसान, पशु व पक्षियों केलिए हानिकारक है। ये जानकारी देने के लिए गाव-गाव अभियान चलाएंगे। अकील अहमद ने बताया कि पराली जलाना हानिकारक है। अब इसे न जलाने का संकल्प लिया है। दूसरों को भी बताएंगे। उस्मान अली का कहना है कि क्षेत्र में पराली जलाने का चलन नहीं है लेकिन जो लोग ऐसा कर रहे हैं उन्होंने रोकेंगे। पराली जलाने के विरोध में आगे आए सामाजिक संगठन

खेत में पराली जलाना पर्यावरण के लिए नुकसानदायक है। शासन और प्रशासन भी इसे लेकर गंभीर है। प्रशासन ने जिले में 21 लोगों पर जुर्माना भी डाला है, फिर भी किसान पराली जला रहे हैं। इसे रोकने के लिए सामाजिक संगठनों को भी आगे आने की जरूरत है। खेतों में पराली जलाने से जहरीला धुआ फैलता है। इससे निकलने वाली गैसों से आसमान में धुंध बनी रहती है। इससे आख और श्वांस संबंधी बीमारिया भी होती है। इसीलिए एनजीटी ने इस पर प्रभावी रोक लगाने के लिए जुर्माने की व्यवस्था भी की है। इस संबंध में सरकार को निर्देश भी दिए हैं। इसी के अनुपालन में प्रशासन ने जिले में दो दिन पहले अभियान चलाया और 21 किसानों पर जुर्माना भी डाला। पराली खेतों में न जलाई जाए, इसके लिए किसानों को जागरूक करने की जरूरत है। सामाजिक संगठनों को भी आगे आने की जरूरत है। अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा के जिलाध्यक्ष देवेंद्र सिंह का कहना है कि किसानों को पराली नहीं जलानी चाहिए, क्योंकि यह पर्यावरण को बहुत नुकसान पहुंचाती है। आसमान में धुआ छा जाता है, जो लोगों की सेहत के लिए भी हानिकारक साबित होता है। उन्होंने कहा कि सरकार को भी इस समस्या के समाधान के लिए ऐसे कृषि यंत्र तैयार करने चाहिए, जिनसे पराली को काटकर खाद के रूप में इस्तेमाल किया जा सके। इन यंत्रों पर अनुदान भी दिया जाए, ताकि ज्यादा से ज्यादा किसान इन्हे खरीद सकें। वैश्य सभा के जिलाध्यक्ष भारत भूषण गुप्ता ने कहा कि किसान भाइयों को पराली से होने वाले नुकसान के बारे में सोचना चाहिए। इससे पर्यावरण को तो नुकसान होता ही है। साथ ही धुएं से किसानों के स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ता है। किसानों को पराली की खाद बनानी चाहिए।

Posted By: Jagran