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अमरोहा। नसरीन बानो गांव वालों के लिए अब खुदा से कम नहीं हैं। उनकी मेहनत और जज्बे को स्वास्थ्य विभाग भी सलाम करता है। नसरीन ने स्वास्थ्य विभाग में वैक्सीनेटर के पद से नौकरी की शुरुआत की। आज अपनी मेहनत से आशा संगनी तक पहुंच गईं। नसरीन ने अपनी मेहनत से गांव के लोगों को शासन की योजनाओं से जागरूक किया। कुपोषित बच्चों को पोषण पुनर्वास केंद्र (एनआरसी) में भर्ती कराया और गांव को कुपोषण से मुक्त कराया। अब नसरीन जहां के अंडर में 16 आशाएं काम करती हैं।  

जोया विकास खंड के गांव ढकिया चमन निवासी नसरीन बानो का निकाह शफीक अहमद के साथ हुआ था। जब वह गांव आईं तो गांव में कुछ बच्चे कुपोषण के शिकार थे। महिलाओं की घर पर ही डिलीवरी होती थी। लापरवाही में कभी-कभी जच्चा-बच्चा की मौत हो जाती थी। बच्चों को पोलियो ड्राप कम पिलाई जाती थी, साथ ही टीकाकरण भी बहुत कम होता था। टीम को गांव वाले भगा देते थे। यह देख नसरीन बानो के मन में गांव वालों के लिए कुछ कर गुजरने की इच्छा जागी। वर्ष 2006 में ग्राम प्रधान इनामुल हसन से मिलकर स्वास्थ्य विभाग में काम करने की इच्छा जाहिर की। ग्राम प्रधान ने स्वास्थ्य विभाग में वैक्सीनेटर के रूप में नसरीन बानो को लगवा दिया। वैक्सीनेटर के रूप में नसरीन बानो ने अपनी कड़ी मेहनत के बल पर गांव में घर-घर घूमकर लोगों को कुपोषण के प्रति जागरूक किया। उन्हें बच्चों का सही समय पर खानपान, साफ-सफाई पर ध्यान देने के लिए कहा। कुपोषित बच्चों को पोषण पुनर्वास केंद्र (एनआरसी) में भर्ती कराकर गांव को कुपोषण से मुक्त कराया और गांव को सुपोषण की राह पर ला दिया। इस प्रकार नसरीन बानो बुलंदियों को छूती गईं और वर्ष 2014 में आशा से आशा संगिनी बन गईं। अब गांव में 100 फीसद टीकाकरण होने लगा है। गांव की महिलाएं भी अब घर पर डिलीवरी नहीं कराकर संस्थागत प्रसव कराने लगीं। वर्तमान में उनके नियंत्रण में 24 आशाएं काम करती हैं। 

 आशा सम्मेलन में हो चुकी हैं सम्मानित

नसरीन बानो की कामयाबी की चर्चा गांव में ही नहीं, बल्कि जिलेभर में है। गांव में सौ फीसद टीकाकरण, अस्पतालों में महिलाओं की डिलीवरी, गांव को कुपोषण से मुक्त कराना और पुरुषों और महिलाओं की नसबंदी आदि कराने में अग्रणी रहने पर तत्कालीन डीएम ने आशा सम्मेलन में उन्हें जनपद में दूसरा पुरस्कार देकर सम्मानित किया था।

 मौलवियों ने भी नसबंदी का किया था विरोध

नसरीन बानो जब गांव में महिलाओं और पुरुषों को नसबंदी के लिए प्रेरित करती थीं तो गांव व आस-पास के मौलवियों ने इसका विरोध किया लेकिन, नसरीन बानो ने किसी तरह समझाकर महिलाओं और पुरुषों को नसबंदी के लिए राजी किया।

Posted By: Narendra Kumar

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