साहित्य से जुड़ाव युवाओं में पैदा करेगा संस्कार, नाट्यशास्त्र में भी छिपा जीवन का ज्ञान: डॉ. रामानंद शर्मा
मुरादाबाद में आयोजित विचार गोष्ठी में युवाओं को साहित्य से जोड़ने और उनमें संस्कार व संवेदनशीलता विकसित करने पर जोर ...और पढ़ें

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साहित्य युवाओं में संस्कार, संवेदनशीलता और सही-गलत की समझ बढ़ाता है।
भारतीय साहित्य और नाट्यशास्त्र जीवन को समझने की व्यापक दृष्टि देते हैं।
मुरादाबाद में युवाओं, साहित्य और समाज पर महत्वपूर्ण विचार साझा हुए।
जागरण संवाददाता, मुरादाबाद। युवाओं को साहित्य से जोड़ना केवल पढ़ने की आदत विकसित करना नहीं, बल्कि उनमें संस्कार, संवेदनशीलता और सही-गलत के बीच अंतर समझने की दृष्टि पैदा करना भी है। बचपन से ही साहित्य के प्रति रुचि विकसित होगी तो युवा समाज और राष्ट्र के प्रति अपने दायित्वों को बेहतर ढंग से समझ सकेंगे।
भारतीय साहित्य और नाट्यशास्त्र में जीवन को देखने, सुनने, समझने और अनुभव करने की ऐसी ही व्यापक दृष्टि मिलती है। यह विचार हिंदू कालेज के पूर्व प्राचार्य डॉ. रामानंद शर्मा ने शुक्रवार को दैनिक जागरण कार्यालय में हुई विचार गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए व्यक्त किए। गोष्ठी का विषय युवा, साहित्य व समाज रहा।
डॉ. शर्मा ने युवाओं को साहित्य संस्कृति रखते हुए कहा कि युवाओं को अच्छे और बुरे का अंतर समझाना जरूरी है। इसके लिए केवल उपदेश पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि बचपन से ही उनके भीतर अच्छे साहित्य, विचारों और संस्कारों के प्रति रुचि पैदा करनी होगी। युवा देश का भविष्य हैं। उनके विचारों और व्यवहार में सकारात्मक बदलाव समाज को भी नई दिशा दे सकता है।
साहित्य, युवा और समाज के आपसी संबंधों पर विचार किए साझा
दैनिक जागरण के पूर्व प्रधान संपादक नरेन्द्र मोहन की जयंती पर शनिवार को दिल्ली के महाराष्ट्र सदन में जागरण साहित्य सृजन सम्मान समारोह होगा। इसमें 11 लाख रुपये की सम्मान राशि दी जानी है। जिसके क्रम में ही देश के विभिन्न शहरों में विभिन्न विषयों पर विचार गोष्ठियों का आयोजन किया गया। इसी क्रम में मुरादाबाद में भी विचार गोष्ठी आयोजित की गई। पूर्व संध्या पर हुई गोष्ठी में डॉ. शर्मा ने साहित्य, युवा और समाज के आपसी संबंधों पर विचार साझा किए गए।
साहित्य और भारतीय ज्ञान परंपरा के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि युवाओं को नाट्यशास्त्र जैसे ग्रंथों का भी अध्ययन करना चाहिए। इसमें केवल नाटक और अभिनय की विधाएं ही नहीं, बल्कि मानवीय भावनाओं, व्यवहार, संवाद और जीवन के विविध पक्षों को समझने का अवसर मिलता है। नाट्यशास्त्र पढ़ने से व्यक्ति को यह जानने का मौका मिलता है कि भावनाएं किस तरह अभिव्यक्त होती हैं और कला समाज को किस तरह प्रभावित करती है।
इससे युवाओं में देखने, सुनने और समझने की क्षमता विकसित हो सकती है। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि सेवानिवृत्ति के बाद भी अगर कोई साहित्य, रचनाशीलता से नहीं जुड़ता है तो उसे स्वास्थ्य परेशानी होने लगती है। बीमार रहने लगेगा। जो चीज स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह है तो उसे छोड़ दें।
आयुर्वेद का पुराना सिद्धांथ है कि रात 10 बजे से 12 बजे तक की नींद शरीर के लिए बहुत अच्छा समय माना जाता है। सबके पास 24 घंटे ही हैं। इसलिए नियमों का पालन करें। विचार गोष्ठी में डॉ. अर्चना गुप्ता, डॉ. मोहम्मद आसिफ, फरहत अली खां, मयंक शर्मा, धवल दीक्षित, राजीव प्रखर ने भी युवा पर विचार व्यक्त किये।
युवा, साहित्य और समाज यह बहुंत बड़ा विषय है। इसको त्रिकोणीय अंदाज से देखें तो युवा केंद्र बिंदु हैं। आजकल जेन जी और जेन अल्फा की बात हो रही है। युवा साहित्य से जुड़ा है। फर्क बस इतना है कि 30 सेकेंड की रील स्क्रोलिंग में वह अपना निर्णय ले लेता है। साहित्य बड़ा कैनवास है। इसलिए उन्हें साहित्य को गंभीरता से देखना, पढ़ना चाहिए। युवाओं का समाज से जुड़ाव कितना है। दूरी संवेदनहीन बना रही है। -राजीव सक्सेना, साहित्यकार
बच्चों की कविताओं में छंद है। जहां छंद है वहां रुचि है। उदाहरण के तौर पर 76 के फूल 32 की माला, बुरी नजर वाले तेरा मुंह काला, इसमें छंद है। पेड़ की जड़ और शाखाएं आपस में संवाद करती हैं। यह भी ठीक उसी तरह होना चाहिए कि बुजुर्गों से युवाओं को जुड़कर संवाद करना चाहिए। आजकल बच्चों में संस्कार का अभाव है। बुजुर्गों के पास बहुत कुछ सीखने को मिलता है। इसलिए बच्चों के साथ संवाद बनाएं और उन्हें संस्कार की जानकारी दें। -कृष्ण कुमार नाज, गजलकार
हर पीढ़ी अपने समय में युवा रही है। हर दौर में पुरानी पीढ़ी कहती रही है कि युवा जड़ों से कटे हुए हैं। मैं यह कहूंगा कि युवा साहित्य से जुड़ा है। युवा रोजगार की बात करता है तो उसी के हिसाब से रचनाएं गढ़ी जाएं। जिससे वह रचनाओं को समझेंगे और सकारात्मक-नकारात्मक समझाने का काम बड़ों का है। बड़ों को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। तभी युवा साहित्य संस्कार की ओर आकर्षित होंगे। -योगेंद्र वर्मा व्योम, नवगीतकार
हर पिछली पीढ़ी इस खुशफहमी में रहती है कि हम उनसे बेहतर हैं। अगली पीढ़ी ने साहित्य नहीं पढ़ा है। इसे जेनरेशन गैप कहते हैं। युवा कभी भी साहित्य से दूर नहीं रहा है। हां वह डिजिटल प्लेटफार्म से जुड़ गया है। फर्क सिर्फ इतना है कि नई पीढ़ी अपनी विशेषता नहीं बताती है। जेन जी में सकारात्मक अप्रोच है। बस बड़ों को अपनी मर्जी नहीं थोपनी है। उन्हें सुझाव दें। जिससे वह उसकी ओर आकर्षित हों। -जिया जमीर, शायर
किसी भी समाज का भविष्य युवाओं के सपनों में पलता दिखाई देता है। युवा जागरूक और संवेदनशील होते हैं। जागरण के पूर्व प्रधान संपादक स्व. नरेंद्र मोहन जी का युवा चेतना कालम चेतना के लिए ही था। वह युवाओं को सांस्कृतिक परंपराओं से जोड़ते थे। उन्होंने इसे अपना सामाजिक उत्तरदायित्व समझा। -डॉ. मनोज रस्तोगी, हिंदी साहित्य शोध केंद्र
