मुरादाबाद : श्रावण मास शुरू हो गया है। यह पूरा माह भगवान शिव को समर्पित रहता है। हिंदू देवी-देवताओं के बीच किसी भी देव ने भारतीय संस्कृति को इतना प्रभावित नहीं किया जितना भगवान शिव ने किया है। यह सर्वज्ञ है कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश हिंदू धर्म में एक त्रिमर्ति के रूप में हैं। भागवान शिव हर तरह से हमारे रक्षक हैं, परन्तु इनमें महेश के रूप में शिव अकेले ऐसे देव हैं जो भृकुटि तन जाने पर विनाशक के रूप में भी हमारे सामने आते हैं। दरअसल शिव के कई रूप हैं। वे शिवलिंग के रूप में पूजे जाने वाले परमेश्वर हैं। इसलिए इस रूप में वे भगवान के अमूर्त रूप में हैं। शिव नटराज के रूप में ताडंव करते अपनी अभिव्यक्ति देते नजर आते हैं। वे रुद्र हैं। वे कैलाश पर्वत पर निवास करने वाले कैलाशनाथर हैं। वे पशुपतिनाथ हैं। वे उमापति भी हैं। वे गंगा को अपनी जटाओं में धारण करने के कारण जटाधारी भी हैं। वे निडर त्रिशुलधारी हैं। यौन शक्ति से जुड़े प्रेम और काम के प्रतीक के रूप में शिवलिंग सदैव पूज्य है। हिंदू साहित्य का 80 फीसद भाग शिव का समर्पित

यहां यह भी ध्यान देने योग्य तथ्य है कि हिंदू साहित्य का अस्सी फीसद भाग शिव भगवान कों ही समर्पित है। वेद,महाकाव्य व पुराणों इत्यादि सभी में भगवान शिव का गुणगान मिलता है। यही वजह है कि हिंदू धर्म में लाखों-लाखों भक्तों के द्वारा भगवान शिव की पूजा-अर्चना पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ की जाती है। वैदिक काल से पूर्व शिव की पूजा

इतिहासकार मानते हैं कि भगवान के रूप में शिव की पूजा का इतिहास वैदिक काल के पूर्व से मिलता है। ऐसा विश्वास किया जाता है कि गैर आर्यन प्रजातियों में भी शिव की पूजा की जाती रही है। सूत्र बताते हैं कि वैदिक और वैदिक काल से पूर्व शिव को रुद्र नाम से भी जाना जाता है सिंधु घाटी की सभ्यता में भी शिव के रूप में एक ध्यानमग्न योगी का स्वरूप मिलता है। ऐतिहासिक तथ्य यह भी बताते हैं कि ईसा पूर्व की दूसरी व तीसरी शताब्दी में भी भगवान शिव की देवता के रूप में पूजा और अर्चना प्रचलन में रही है। भगवान राम ने की थी रामेश्वर में शिव की पूजा

रामायण और महाभारत में भी शिव के अनुयायियों का वर्णन खूब मिलता है। कृष्ण और अर्जुन ने भी शिव की कृपा प्राप्त करने को उनकी पूजा और अर्चना की। अर्जुन की भगवान शिव से पशुपत अस्त्र प्राप्त करने की कथा हम सभी को याद ही है। स्वयं भगवान श्रीराम व हनुमान ने माता सीता का रावण के चगुंल से आजाद कराने हेतु रामेश्वरम में भगवान शिव की पूजा और आराधना की थी। सावन मास में शिव भक्तजन शांत और सहनशील रहें

यहां यह भी ध्यातव्य है कि सावन का यह पूरा महीना भगवान शिव की भक्ति और आराधना एवं समर्पण से जुडे सनातन धार्मिक इतिहास का ही एक हिस्सा है। इस मास में शिवलिंग पर गंगाजल से जलाभिषेक करना शिव भक्ति की प्रमुख गोचर गतिविधि मानी जाती है। इस क्रिया को अमली जामा पहनाने के लिए भक्तगण देश की विभिन्न पवित्र नदियों से जल इकठ्ठा करके प्रसिद्ध शिवलिंगों पर जलाभिषेक करते हुए गृह स्थल पर जाकर अपनी यात्रा सम्पन्न करते हैं। इस क्रिया में वे जप, तप व व्रत इन तीनों त्यागमयी वृत्तियों को एक साथ पूर्ण करते हैं। अत: श्रावण मास में अपनी हिस्सेदारी करने वाले शिव भक्तजनों से अपने अन्त:करण को शुद्ध रखने के साथ-साथ उनसे शान्त व सहनशील बनने की अपेक्षा भी की जाती है। शिव सनातन धार्मिक आस्था का प्रतीक

भारतीय संदर्भ में भगवान शिव से जुड़ा पवित्र धर्म एवं धार्मिक आस्थाएं अफीम नहीं हैं। ये तो हमारे धार्मिक कर्तव्यों की सम्पूर्ति की ओर संकेत देती है। निश्चय ही भगवान शिव के प्रति हमारा समर्पण हमारी सनातन धार्मिक आस्था का ही प्रतीक है। इसको संयम व त्यागमयी संस्कृति के जीने से ही भगवान शिव में हमारी आस्था अक्षुण्ण रह सकेगी।

डॉ. विशेष गुप्ता

पूर्व प्राचार्य

महाराजा हरिश्चन्द्र स्नातकोत्तर महाविद्यालय, मुरादाबाद

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