रामपुर (भास्कर ङ्क्षसह)। मदरसों के छात्र आमतौर पर मौलाना, मुफ्ती या इमाम ही बनते हैं, लेकिन मौलाना मुहम्मद इस्हाक रिजवी के मदरसे में पढ़ रहे छात्र मौलाना के साथ-साथ डॉक्टर व प्रोफेसर भी बन रहे हैं। वह दीनी तालीम के साथ साथ छात्रों को दुनियावी तालीम में आगे बढऩे के लिए प्रेरित करते हैं। उनके द्वारा पढ़ाए गए छात्रों में कोई जेएनयू (जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी) से पीएचडी कर रहा है तो कोई एएमयू (अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी) से बीयूएमएस। यही नहीं उनके पास पढ़े कई छात्र सरकारी नौकरियां भी कर रहे हैं। मौलाना मुहम्मद इस्हाक मिस्बाही मूल रूप से ग्राम लाला नगला केमरी के रहने वाले हैं। उन्होंने अपनी तालीम मदरसा अलजामियातुल अशरफिया मुबारकपुर आजमगढ़ से की। इसके बाद उन्होंने विभिन्न मदरसों में छात्रों को तालीम दी। अब गांव में ही अपने मदरसा गौसिया रिजविया में पढ़ाते हैं। अरबी भाषा पर उनकी अच्छी पकड़ है, जिसकी वजह से दूर-दूर से छात्र उनके पास पढऩे आते हैं। वह हमेशा अपने यहां पढऩे वाले छात्रों के भविष्य को लेकर ङ्क्षचतित रहते हैं। यही वजह है कि उन्होंने अपने छात्रों को दीनी तालीम के साथ-साथ दुनियावी तालीम पर जोर देते हैं। उनके पास नौ साल पढ़े डॉ. जुबैर अली आज लखनऊ के तकमीलुत्तिब मेडिकल कालेज में प्रोफेसर हैं। वहीं डॉक्टर अकील अहमद अपना क्लीनिक चलाते हैं। वर्तमान में मौलाना जुनैद व मौलाना मसूद जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी से पीएचडी कर रहे हैं तो मौलाना तारिक व मौलाना साईब अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से बीयूएमएस कर रहे हैं।

15 किताबों का अरबी भाषा में किया तर्जुमा

मौलाना की काबलियत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उन्होंने इमाम अहमद रजा खां बरेलवी आला हजरत की उर्दू भाषा में लिखी हुई लगभग 15 किताबों का अरबी भाषा में तर्जुमा किया। इसके साथ ही वह अरबी ग्रामर पर भी 30 किताबें लिख चुके हैं। मौलाना इस्हाक कहते हैं कि मुसलमानों को दीनी तालीम के साथ-साथ दुनियावी तालीम पर महारत होनी चाहिए। जब तक दुनियावी तालीम हासिल नहीं करेंगे तब तक दीनी तालीम का फायदा हासिल नहीं हो सकता।  

Posted By: Ravi Singh

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