मुरादाबाद(प्रांजुल श्रीवास्तव)। जो तूफानों में पलते जा रहे हैं, वही दुनिया बदलते जा रहे हैं। जिगर मुरादाबादी की कलम का यह शेर मुरादाबाद की शोभा पर सटीक बैठता है। दरअसल, तूफानों को देख कर अच्छे-अच्छों के हौसले टूट जाते हैं, लेकिन जो इन तूफान में डट कर खड़े होते हैं, वही दुनिया बदलने की कुव्वत भी रखते हैं। मधुमक्खी पालन से शुरू हुई शोभा की एक छोटी सी पहल आज कई व्यापार में बंट गई है। बैग सीना, सिलाई-कढ़ाई जैसे कारोबार की मदद से शोभा ने 150 से ज्यादा लड़कियों को रोजगार तो दिया ही साथ ही उन्हें सशक्त होने का माध्यम भी बना दिया। 

शोभा खुद ऐसी लड़की हैं जिनकी पढ़ाई खराब आर्थिक हालातों के कारण कक्षा आठ में ही छूट गई थी। पिता हुकुम सिंह गांव से दूध खरीदकर शहर में बेचते थे लेकिन, इतनी सी रकम में दो छोटी बहनों और एक भाई का पेट पालना मुश्किल हो रहा था। ऐसे में शोभा जब 16 साल की हुई तो गांव के एक ताऊ को मधुमक्खी पालन का कारोबार करते हुए देखा लेकिन,   लड़की होने के कारण उनको घर पर बिठा दिया गया। उन्होंने यहीं हार नहीं मानी, खुद से जोड़े गए छह हजार रुपयों से 2010 में मधुमक्खी पालन के लिए दो बॉक्स खरीद लिए लेकिन, सही प्रशिक्षण न मिलने के कारण उन्हें इस काम में काफी नुकसान भी हुआ। 

प्रशिक्षण के बाद शुरू हुई उड़ान

सिंडिकेट बैंक के ग्रामीण स्वरोजगार प्रशिक्षण संस्थान से मधुमक्खी पालन का प्रशिक्षण लेने के बाद उन्होंने 12 लड़कियों को अपने साथ जोड़ा।  इसके बाद शोभा ने कभी मुड़ कर नहीं देखा। आज शोभा 45 बॉक्स में मधुमक्खी पालन करती हैं जिससे करीब 315 लीटर शहद निकलता है। 

सीखी सिलाई और लडऩे लगीं गरीबी के खिलाफ जंग

मधुमक्खी पालन का काम मौसमी था, इसलिए शोभा ने सिलाई का काम भी सीखा। इसके बाद उन्होंने इसका निश्शुल्क प्रशिक्षण देकर अपने साथ करीब 60 लड़कियों को जोड़ा जो इसी काम से जुड़ कर सभी अपना घर चला रही हैं। शोभा बताती हैं कि उन्होंने बैग बनाना शुरू किया जिसके बाद उनके पास कई ऑर्डर आए। उनके साथ जुड़ी हर लड़की वर्तमान में करीब सात हजार रुपये प्रतिमाह कमा रही है। 

Posted By: Narendra Kumar