मुरादाबाद। पंचकूला (हरियाणा)की इमारतें अब उन्नाव निवासी अनिल और तेजबहादुर के लिए बेमानी हैं। लॉकडाउन में दिहाड़ी बंद हुई तो खाने के लाले पड़ गए। ऑटो की कुछ कमाई थी, वह भी बंद हो गई। गांव के अलावा कोई दूसरा सहारा नहीं दिखा। सो, चल पड़े। रास्ते में सहारनपुर पुलिस ने डंडे भी मारे। रात भर आटो दौड़ाई तो शनिवार को ग्यारह बजे मुरादाबाद की सरहद में दाखिल हो सके। 19 घंटे के सफर में 339 किमी की दूरी तय की। मगर मंजिल अभी भी दूर है।

यूपी सरकार ने प्रवासियों को घर पर काम के मौके देने की बात कही तो कामगार अनिल कुमार और तेजबहादुर की उम्मीदों को पंख लग गए। पंचकूला में काम न होने पर कुनबे का पेट पालना भारी पड़ रह था इसलिए शुक्रवार की शाम चार बजे पत्‍‌नी व बच्चों के साथ खुद की ऑटो से निकल पडे़। दोनों ने मिलकर ड्राइविंग का जिम्मा संभाला और बच्चों को पीछे बैठा दिया।

दोनों दोस्त पंचकूला में बेलदारी का काम करते थे। अनिल चार साल पहले और तेजबहादुर दस साल पहले वहां गया था। दिहाड़ी से काम नहीं चला तो तेजबहादु़र ने साल भर पहले कर्ज पर ऑटो खरीद लिया। मगर, लॉकडाउन ने दानों की चलती गृहस्थी उजाड़ दी। बेलदार, ईट-पत्थर उतारने और राजमिस्त्री के हेल्पर के रूप में काम करने वाले परेशान हो गए।

अनिल का कहना है कि रानी (उसकी बीवी) पेट से है। सातवां महीना चल रहा है। दो छोटे बच्चे हैं। अब वहां रोटी भी मुश्किल थी। इसलिए वापसी के अलावा कोई चारा नहीं था, लेकिन सफर ने आंखों में आंसू ला दिए। पास और वाहन के कागजात होने के बाद भी पुलिस रास्ते में परेशान कर रही है। ऑनलाइन परमिशन बनवाई थी। सहारनपुर में पुलिस ने गालियां दीं और डंडों से पीटा।

तेजबहादुर ने कहा कि ऑटो की घर से बकाया किस्त चुका देंगे और घर पर ही स्थिति सामान्य होने पर गाड़ी चलाएंगे लेकिन, परदेस नहीं जाएंगे। अभी उन्नाव तक का सफर बाकी है। मूख से आंखों के सामने अंधेरा छा जा रहा है।

Posted By: Jagran

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