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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Aug 03, 2016 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

डॉ. रामानंद शर्मा पर हो चुका है शोध

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Published: Wed, 03 Aug 2016 02:10 AM (IST)

जागरण संवाददाता मुरादाबाद : जिगर कालोनी निवासी और ¨हदू कॉलेज के पूर्व प्राचार्य डॉ. रामानंद शर्मा के

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जागरण संवाददाता मुरादाबाद : जिगर कालोनी निवासी और ¨हदू कॉलेज के पूर्व प्राचार्य डॉ. रामानंद शर्मा के सम्मानों में सोमवार को विद्या भूषण सम्मान की घोषणा होते ही एक और नगीना जुड़ गया। डॉ. शर्मा ¨हदू कॉलेज में प्राचार्य पद से 30 जून 2014 को सेवानिवृत्त हुए थे। साहित्य के क्षेत्र में उनकी ¨हदी के अलावा संस्कृत पर भी मजबूत पकड़ है। डॉ. शर्मा ने पाली, प्राकृत भाषा पर काम किया है। प्राकृत पर वह प्रोजेक्ट कार्य कर चुके हैं, जबकि अन्य विषयों में उनकी किताबें छप चुकी हैं। अब तक लगभग 48 पीएचडी करवा चुके हैं, जिसमें से 20 छप भी चुकी हैं।

बरेली कॉलेज में हुआ है शोध

साहित्य के क्षेत्र में यह उनका अद्वितीय योगदान ही है कि उन पर बरेली कॉलेज में ¨हदी के विभागाध्यक्ष डॉ. अशोक उपाध्याय के निर्देशन में वर्ष 2012 में छात्र राजीव ने रीति काव्य के संपादन-व्याख्यायन की परंपरा और डॉ. रामानंद शर्मा विषय पर शोध किया। इसका प्रकाशन दिल्ली में किया गया है। इसके अलावा करीब तीन लघु शोध पत्र भी प्रकाशित हो चुके हैं।

रीति काल से रहा है लगाव

डॉ. शर्मा को रीति काल से विशेष लगाव रहा है। वर्ष 1990 से अब तक वह ¨हदी के लगभग एक दर्जन भूले बिसरे कवियों को ढूंढकर उनकी ग्रंथावलियों पर शोध करवा चुके हैं। जिनमें करण भट्ट, कालीदास त्रिवेदी, उदयनाथ कविंद्र, मुबारक, जीवनलाल नागर आदि है।

बाहरी विश्वविद्यालयों में दे चुके हैं सेवा

डॉ. रामानंद शर्मा रूहेलखंड विश्वविद्यालय द्वारा बनाई जाने वाली सभी समितियों के सदस्य रह चुके हैं। इसके अलावा मेरठ, आगरा, कुमायूं विश्वविद्यालय में अतिथि शिक्षक के रूप में अपनी सेवाएं दे चुके हैं। डॉ. शर्मा अब भले ही सेवानिवृत्त हो चुके हैं, लेकिन ¨हदी विषय से संबंधित समस्या लेकर आने वाले छात्रों का अभी भी मार्गदर्शन करते हैं।

कनाडा में पढ़ाई जा रही है किताब

कनाडा के ओटावा स्थित कार्टन यूनिवर्सिटी के इंडियन स्टडीज विभाग में डॉ. शर्मा की ¨हदी की एक किताब पढ़ाई जाती है। किताब में संस्कृति, साहित्य, नृत्य, आध्यात्म आदि को जोड़ा गया है। भारत में इसकी कीमत पांच हजार रुपये है। किताब की खासियत है कि इसमें मुगलकाल के चित्र भी मौजूद हैं।

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वर्जन..

भारतीयों का दुर्भाग्य है कि दूसरों के कहने पर हम अपने मूल्यों का आकलन करते हैं। शिक्षकों को कर्मठ बनकर अपनी भाषा की सेवा करनी चाहिए।

डॉ. रामानंद शर्मा, पूर्व प्राचार्य, ¨हदू कॉलेज।