कहां बनती है गणेश- लक्ष्मी की दीपावली पर पूजी जाने वाली मूर्तियां? तैयार होने में लगते हैं आठ महीने
चुनार में दीपावली के लिए लक्ष्मी-गणेश की प्रतिमाएं आठ महीने की मेहनत से तैयार होती हैं, जो अब बाजार में ...और पढ़ें
HighLights
चुनार में बनती हैं दीपावली की लक्ष्मी-गणेश प्रतिमाएं।
कीमत और डिजाइन दोनों में विविधता
‘मेड इन चुनार’ प्रतिमाओं की मांग अधिक
जागरण संवाददाता, चुनार (मीरजापुर)। दीपावली की रात घर-घर दीप जलेंगे, मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा होगी। लक्ष्मी पूजा की इस आस्था में चुनार के कारीगरों के हुनर की चमक भी शामिल होगी। यहां महीनों पहले आकार लेने वाली पीओपी की लक्ष्मी-गणेश प्रतिमाओं का बाजार अब सज चुका है।
दीपावली से करीब डेढ़-दो महीने पहले बाजार में रौनक बढ़ती है, लेकिन इन प्रतिमाओं के पीछे कारीगरों की करीब आठ महीने की मेहनत होती है। उत्तर प्रदेश के चार दर्जन से अधिक जिलों से लेकर बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश तक पहुंचने वाली ‘मेड इन चुनार’ प्रतिमाएं इस बार भी लाखों घरों की पूजा का हिस्सा बनने को तैयार हैं।

करीब साढ़े दशक पहले मध्य प्रदेश से चुनार आए स्व. अर्जुन यादव ने पीओपी से लक्ष्मी-गणेश की प्रतिमा तैयार कर इस परंपरा की शुरुआत की थी। तब एक छोटे प्रयास के रूप में शुरू हुआ यह काम आज चुनार के बड़े कुटीर उद्योग का रूप ले चुका है। स्टेशन रोड, उस्मानपुर, टेकौर, भरपुर, पीरवाजी शहीद समेत नगर के कई मोहल्लों में 500 से अधिक छोटे-बड़े कारखानों में प्रतिमाएं तैयार की जाती हैं। इस उद्योग से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से करीब सात से आठ हजार लोगों की आजीविका जुड़ी है।
सांचे में ढलता है आकार, कारीगरों द्वारा भरे गए रंगों से आती है आभा
एक प्रतिमा तैयार होने की प्रक्रिया भी अपने आप में लंबी कहानी है। कारीगर पहले सांचे तैयार करते हैं, फिर पीओपी से प्रतिमा को आकार दिया जाता है। इसके बाद सुखाने तथा कारीगरों द्वारा मूर्ति में रंग-रोगन करने के बाद सजावट के कई चरणों से गुजरकर प्रतिमा बाजार तक पहुंचती है।
इसी वजह से दीपावली का बाजार भले डेढ़-दो महीने पहले दिखाई देता हो, मगर कारखानों में इसकी तैयारी कई महीने पहले शुरू हो जाती है। आज स्टेशन रोड पर करीब तीन सौ से अधिक दुकानों में अलग-अलग आकार और डिजाइन की प्रतिमाएं सज चुकी हैं और खरीदारों की आवाजाही भी बढ़ने लगी है।
पांच रुपये से ढाई सौ तक, हर पसंद की प्रतिमा
चुनार के बाजार में प्रतिमाओं की कीमत और डिजाइन दोनों में विविधता है। पांच रुपये की छोटी प्रतिमा से लेकर ढाई सौ रुपये तक की आकर्षक लक्ष्मी-गणेश प्रतिमाएं उपलब्ध हैं। कच्चे माल, रंग और श्रम की बढ़ती लागत के बीच कारीगर ग्राहकों की जरूरत और बजट को ध्यान में रखकर प्रतिमाएं तैयार कर रहे हैं।
यही वजह है कि स्थानीय खरीदारों के साथ थोक कारोबारी भी यहां पहुंचते हैं। चुनार में तैयार प्रतिमाओं की मांग लखनऊ, प्रयागराज, कानपुर, रायबरेली और उन्नाव समेत उत्तर प्रदेश के कई जिलों में है। बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश तक भी यहां से प्रतिमाएं भेजी जाती हैं। पितृपक्ष के बाद नवरात्र से कारोबार में तेजी आने लगती है और दीपावली से पहले बाजार सबसे अधिक सक्रिय रहता है।

कारोबार के साथ हजारों घरों की उम्मीद
व्यापारी कृष्णा यादव, राजेश कुमार यादव, लक्ष्मीकांत गुप्ता, अवधेश कुमार वर्मा, समर्थ सिंह पटेल, मणि मौर्या बताते हैं कि हर साल लक्ष्मी-गणेश की प्रतिमाओं की मांग बढ़ रही है। इस बार भी बाजार से बेहतर कारोबार की उम्मीद है। दीपावली के दौरान इस उद्योग का कारोबार 30 से 40 करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है। चार दशक से अधिक समय में चुनार का यह कुटीर उद्योग पूजा की प्रतिमाएं तैयार करने से आगे बढ़कर हजारों परिवारों की आजीविका, स्थानीय बाजार और नगर की पहचान का महत्वपूर्ण आधार बन गया है।
बोले कारोबारी
दीपावली से पहले प्रतिमाओं की बिक्री तेज हो गई है। इस बार अलग-अलग आकार की प्रतिमाओं की मांग बढ़ी है। बिक्री अच्छी रही तो कारीगरों और दुकानदारों की आमदनी बढ़ेगी। - अजय कुमार प्रजापति निर्माता व विक्रेता चुनार।
चुनार में प्रतिमाएं तैयार होने से कारीगरों के साथ रंग, सजावट और परिवहन से जुड़े लोगों को भी काम मिलता है। दीपावली का कारोबार हजारों परिवारों की अर्थव्यवस्था को सहारा देता है। - कमलेश कुमार, दुकानदार चुनार।
हम हर साल चुनार से लक्ष्मी-गणेश की प्रतिमाएं थोक में ले जाते हैं। यहां डिजाइन और कीमत दोनों में विकल्प मिलते हैं। बिक्री बढ़ने से हमारे साथ स्थानीय कारोबारियों की आय भी बढ़ती है। - मंटू कुमार व्यापारी, जहानाबाद-बिहार।
चुनार की प्रतिमाओं की मांग हमारे क्षेत्र में अच्छी है। यहां से थोक खरीद करने पर लागत नियंत्रित रहती है। दीपावली की बिक्री से जुड़े सभी कारोबारियों की आर्थिक स्थिति बेहतर होती है। - पवन गोस्वामी, व्यापारी, रोहतास बिहार।
