मीरजापुर की पूर्व डीएम दिव्या मित्तल ने इस्तीफा देने के बाद वीडियो जारी कर लगाए सनसनीखेज आरोप
पूर्व मीरजापुर डीएम दिव्या मित्तल ने आईएएस पद से इस्तीफा देने के बाद एक वीडियो जारी कर व्यवस्था पर सवाल ...और पढ़ें
HighLights
पूर्व आईएएस दिव्या मित्तल ने इस्तीफा देकर वीडियो में किए खुलासे।
लहुरिया दह में स्कूल न बनने पर व्यवस्था पर उठाए सवाल।
राजस्व विभाग की कार्यशैली, युवाओं के भविष्य पर जताई चिंता।
जागरण संवाददाता, मीरजापुर। आजादी के 70 सालों बाद हलिया के पहाड़ी क्षेत्र लहुरिया दह गांव में पानी पहुंचाकर लोगों के चेहरों पर खुशी लाई, लेकिन कहीं न कहीं इसका खमियाजा उनको उठाना पड़ा। ट्रांसफर के बाद लगभग 9 माह वनवास काटना पड़ा। आखिरकार भारतीय प्रशासनिक सेवा से इस्तीफा दे दिया।
इस्तीफा स्वीकार होने के बाद जनसेवा करने में जुट गई हैं। लोगों की जिज्ञासाओं के समाधान के लिए वीडियो इंटरनेट मीडिया पर साझा किया। इसमें कई पहलुओं को रखा है।आईएएस दिव्या मित्तल के वीडियो से मचा हड़कंप, व्यवस्था पर सवाल उठाया। बोली स्वीकृति के तीन साल बाद भी लहुरिया दह में स्कूल नहीं बन सका। साथ ही राजस्व विभाग की कार्य शैली से दुखी, बोली ऊपर से कौन काम रोकता है।
आईएएस से त्यागपत्र देने दिया और आपके मन में किसी सवाल छोड़ दिया। कुछ दिन तक जवाब नहीं दिया, क्योंकि हौसला जुटा रही थी। आगे क्या, किसके साथ और क्या। उन्होंने कहा कि तुम सब कुछ तो बन गई हो, अब क्या बनना चाहती हो। उन लोगों की आवाज बनना चाहती हूं।
उनकी आवाज जिनकी किसी दफ्तर में पहुंचती नहीं और पहुँचती है। तो सुनी नहीं जाती है। उन लोगों की तरफ से देश के 80 सालों का हिसाब चाहिए। एक दिन निरीक्षण के दौरान एक महिला ने पानी की बजाए बच्चों के लिए स्कूल मांगा। कहा कि बच्चों की पढ़ाई कक्षा 5 के बाद पहाड़ों में गुम होकर रह जाती है। नियम कानून के अनुसार स्वीकृत करने के 3 साल बाद भी आज तक स्कूल नहीं बना है।
लोगों को न्याय के लिए भटकना पड़ा रहा है। राजस्व विभाग में रहते हुए पट्टा होने के बाद भी कब्जा नहीं दिया गया। पन्नियों में लपटे अन्याय का हिसाब चाहिए। आज बच्चे रात रात पढ़ रहे हैं और पेपर लीक हो जा रहा है। पांच साल तक तैयारी करने के बाद फैसला न्यायालय में पहुंच जाता है। किसान भूमि बेंचकर और महिलाएं गहने बेचकर कोडिंग पढ़ाई करा रहीं हैं। उनका क्या होगा।
आज ए आई आ रहा है। बहुत सारा काम ए आई करेगा। हर नौजवान को डर है। सवाल हो सकता था, सोच तो हो सकती थी। कोई सदन नहीं है, जहां इसकी बात हो सकती थी। हमारे बच्चे जिस ओर चल रहे हैं उसकी किसी को चिंता नहीं है। हमारी राजनीति में सबकुछ है।
सत्ता है, शिलान्यास है, शोर है पर सोच नहीं है। मुझे उस न सोचने का हिसाब चाहिए। उद्देश्य केवल एक राजनेता बदलने का नहीं बल्कि राजनीति बदलनी होगी। इरादे की राजनीति, फ़िक्र की राजनीति और सोच की राजनीति। वह राजनीति नहीं चाहिए जो सीधी बनाकर सत्ता तक पहुंचती है। बल्कि लोगों को सुनती है।
