जागरण संवाददाता, मीरजापुर : जिले के 230 गांवों में पेयजल का संकट गहरा गया है। आठ लाख से अधिक आबादी बूंद-बूंद पानी के लिए परेशान है। ब्लाक स्तर से अभी तक कार्य योजना नहीं बन पाई है। ग्राम प्रधान पानी को लेकर वोट की राजनीति कर रहे हैं। शासन-प्रशासन स्तर से महज कार्ययोजना बनाई जा रही है। धरातल पर कोई काम नहीं हो रहा है। पेयजल के लिए तत्काल कदम नहीं उठाया गया तो स्थिति और बिगड़ जाएगी।

जिले में 809 ग्राम पंचायतें हैं जिसमें 230 गांवों में पेयजल का संकट खड़ा हो गया है। लोग एक से पांच किमी दूर से पानी ले आकर गला तर कर रहे हैं। सबसे ज्यादा समस्या पहाड़ी इलाका पटेहरा, राजगढ़, लालगंज, हलिया, पहाड़ी व छानबे का आंशिक क्षेत्र के गांवों में हो गई है। इन इलाकों में भूगर्भ जलस्तर 80 से ढाई सौ फीट नीचे चला गया है। इससे इन इलाकों के अधिकांश हैंडपंप पानी छोड़ दिए हैं।

लालगंज क्षेत्र के तीस गांव, पटेहरा के 28, राजगढ़ के 32, हलिया के पचीस, पहाड़ी के 26 तथा छानबे क्षेत्र दो दर्जन गांव में पेयजल का संकट हो गया है। जिला प्रशासन पेयजल का जिम्मा ग्राम प्रधानों पर डालकर किनारे हो गया है । ग्राम प्रधान पेयजल समस्या को लेकर वोट की राजनीति शुरू कर दिए हैं। वे सार्वजनिक बोर कराने की बजाय अपने चहेतों का व्यक्तिगत हित साध रहे हैं। राजगढ़ पुलिस चौकी के अलावा बघौड़ा, पतेरी, रैकरी,रैकरा, तेंदुआकला, सरसों, सेमरी, नुनौटी, खोराडीह, रैकरा, रैकरी, सरसों सेमरी जमुती आदि गांवों में टैंकर से पेयजल की आपूíत की जा रही है। शादी विवाह में लोग टैंकर का पानी खरीद कर काम चला रहे हैं। ग्रामीणों को लालीपाप:

शासन प्रशासन व जनप्रतिनिधि अभी तक पेयजल संकट दूर करने के लिए केवल लालीपाप दे रहे हैं। विधायक व सांसद बराबर कहते हैं कि पेयजल संकट के लिए 22 करोड़ रुपये मिल गया है। इससे पेयजल का संकट दूर हो जाएगा। हकीकत यह है कि पहाड़ी इलाकों के 230 गांव संकटग्रस्त के रूप में चिह्नित किए गए हैं। यदि डीप बो¨रग करके पेयजल की व्यवस्था की जाए तो एक बोर पर करीब आठ लाख रुपये का खर्च पड़ रहा है। इस हिसाब से तो एक गांव में एक बोर भी नहीं लग पाएगा। कैसे पेयजल समस्या का समाधान होगा इसका अंदाजा स्वयं लगाया जा सकता है। डीएम बिमल कुमार दुबे ने कहा कि टैंकर से पानी की आपूíत कराई जा रही है।

By Jagran