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190 साल से जीवंत है चुनार की रामलीला, पीढ़ियां बदल गईं पर आज भी नहीं बदला उत्साह

Published: Wed, 30 Sep 2026 06:07 PM (IST)

चुनार की 190 साल पुरानी रामलीला आज भी पूरे नगर को एक सूत्र में बांधे हुए है, जहां पीढ़ियां बदल गईं पर उत्साह बरकरार है।

इस फोटो को एआई टूल की मदद से बनाया गया है।

इस फोटो को एआई टूल की मदद से बनाया गया है।

HighLights

  1. चुनार की रामलीला 190 वर्षों से नगर को जोड़े हुए है।

  2. ब्रिटिश काल से चली आ रही यह परंपरा जीवंत है।

  3. कलाकार और नगरवासी मिलकर त्रेता युग के प्रसंग दर्शाते हैं।

जागरण संवाददाता, चुनार (मीरजापुर)। चुनार की पहचान केवल दुर्ग, गंगा और इतिहास की गलियों से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक स्मृति में यहां की रामलीला के रूप में ऐसी परंपरा भी सांस लेती है, जिसकी उम्र 190 वर्ष हो चुकी है। जीवित्पुत्रिका से शुरू होने वाली चुनार की रामलीला आज भी पूरे नगर को एक सूत्र में बांध देती है।

अंग्रेजी राज के दिनों में कुछ रईसों और धर्मनिष्ठ श्रद्धालुओं के सहयोग से आरंभ हुई यह रामलीला अब 190 वर्षों का गौरवशाली इतिहास संजोए खड़ी है। तीन सप्ताह तक चलने वाले इस आयोजन में मंच पर त्रेता युग के प्रसंग जीवंत होते हैं तो पूरा नगर जैसे एक परिवार की भूमिका में आ जाता है।

कोई कलाकार बनता है, कोई व्यवस्था संभालता है और कोई आर्थिक और शारीरिक सहयोग देकर इस परंपरा को आगे बढ़ाता है। यही सामूहिकता चुनार की रामलीला को महज धार्मिक आयोजन से अलग पहचान देती है।

समय बदला, मनोरंजन के साधन बदले और तकनीक ने जीवन की रफ्तार बदल दी, लेकिन रामलीला को लेकर लोगों का उत्साह आज भी बरकरार है। जिन परिवारों के बुजुर्ग कभी मंच पर पात्र निभाते थे, उन्हीं घरों की नई पीढ़ी आज मंच के पीछे से लेकर अभिनय तक की जिम्मेदारी संभाल रही है। नौकरी, कारोबार और दूसरे कामों से समय निकालकर कलाकार मंच पर अपने पात्र को जीवंत करते हैं।

साधना बनती है मंच की जान

पिछले ढाई-तीन दशकों से निर्देशक अविनाश अग्रवाल के निर्देशन में रामलीला की प्रस्तुति को निरंतरता मिली है। कलाकारों के अभिनय में संवाद के साथ भावों की प्रधानता रहती है। राम का धैर्य, लक्ष्मण का तेज, भरत का त्याग और हनुमान का समर्पण मंच पर अलग-अलग दृश्यों के रूप में उभरता है। वहीं रावण का प्रवेश और उसका संवाद वातावरण में अलग प्रभाव पैदा करता है।

चुनार की 190 वर्ष पुरानी रामलीला आज भी लोक आस्था की जीवंत धरोहर बनी हुई है। यह पीढ़ियों से चली आ रही श्रद्धा, संस्कार और सामूहिक चेतना का उत्सव है, जहां अभिनय में भक्ति घुलकर दर्शकों को त्रेता युग की अनुभूति करा देती है। -लक्ष्मीशंकर पांडेय, अध्यक्ष, श्रीराघवेंद्र रामलीला नाट्य समिति।