यश चोपड़ा की पहली फिल्म का मेरठ से था खास कनेक्शन, फिल्म फेयर अवॉर्ड के लिए नॉमिनेट हुए थे इसके लेखक पं. मुखराम शर्मा
Yash Chopra death anniversary: हिंदी फिल्मों के दिग्गज डायरेक्टरों में यश चोपड़ा का नाम प्रमुख है। उनका देहांत 21 अक्टूबर ...और पढ़ें

यश चोपड़ा और पंडित मुखराम शर्मा के फाइल फोटो। सौ. सोशल मीडिया
HighLights
हिंदी फिल्मों के दिग्गज डॉयरेक्टरों में शामिल है यश चोपड़ा का नाम।
वर्ष 1959 में रिलीज हुई थी यश चोपड़ा की पहली फिल्म।
प्रवीण वशिष्ठ, मेरठ। Yash Chopra death anniversary : यश चोपड़ा का नाम बॉलीवुड इतिहास के प्रमुख डायरेक्टरों में लिया जाता है। उन्होंने पांच दशक से अधिक समय तक अपनी फिल्मों से हर उम्र के दर्शकों का दिल जीता। 27 सितम्बर 1932 को जन्मे यश चोपड़ा का देहांत 21 अक्टूबर 2012 हुआ।
उनकी पुण्यतिथि के अवसर पर आज बतौर डायरेक्टर उनकी पहली फिल्म 'धूल का फूल' की चर्चा करते हैं। इस फिल्म के हिट होने पर एक प्रतिभाशाली निर्देशक की झलक मिल गई थी। 'धूल का फूल' की कहानी मेरठ निवासी लेखक पंडित मुखराम शर्मा की कलम का कमाल थी।
सन 2000 के आसपास होश संभालने वाली पीढ़ी यश चोपड़ा को 'वीरजारा', 'जब तक है जान', 'दिल तो पागल है' जैसी फिल्मों के लिए अधिक जानती है, लेकिन इससे पूर्व के चार दशक के करियर में उन्होंने 'दीवार', 'कभी-कभी', 'त्रिशूल', 'दाग', 'चांदनी' और 'डर' जैसी अनेक सुपर हिट फिल्में दीं।
यश चोपड़ा की 'सिलसिला' और 'लम्हें' सफल नहीं रही, लेकिन इन्हें आज भी समीक्षक उनके अच्छे काम में गिनते हैं। उनकी यश राज फिल्म्स देश की प्रमुख फिल्म निर्माण कम्पनी है। इसी कंपनी ने ऑल टाइम ब्लाॅकबस्टर कही जाने वाली 'दिलवाले दुल्हनियां ले जाएंगे' सहित अनेक बड़ी फिल्मों का निर्माण किया है। डीडीएलजे के निर्देशक उनके बेटे आदित्य चोपड़ा थे और वह इससे निर्माता के तौर पर जुड़े थे।
छह बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार, चार बार सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का फिल्मफेयर अवॉर्ड, साल 2001 में दादा साहेब फाल्के पुरस्कार और 2005 में पद्म भूषण से यश चोपड़ा सम्मानित हुए।
1959 में रिलीज हुई थी 'धूल का फूल'
यश चोपड़ा ने अपने करियर की शुरूआत अपने बड़े भाई बीआर चोपड़ा के साथ असिस्टेंट डायरेक्टर के तौर पर पचास के दशक में की थी। कुछ साल बाद उनके बैनर बीआर फिल्मस के बैनर तले बतौर निर्देशक उन्हें करियर शुरू का अवसर मिला।
फिल्म के कहानीकार के तौर पर उस दौर के जाने-माने लेखक पंडित मुखराम शर्मा को लिया गया। पंडितजी ने विवाह पूर्व के सबंधों पर आधारित कहानी सुनाई। इसका ताना-बाना बिन ब्याही मां के बच्चे को केंद्र में रखकर बुना गया था। जो उस दौर के हिसाब से बहुत अलग विषय था। 'धूल का फूल' वर्ष 1959 में रिलीज हुई।
यश चोपड़ा के निर्देशन में कहानी, गीत-संगीत और कलाकारों के अभिनय ने छोड़ी छाप
इस फिल्म में यश चोपड़ा के उत्कृष्ट निर्देशन में राजेंद्र कुमार, माला सिन्हा, नंदा के साथ-साथ मनमोहन कृष्ण और अशोक कुमार का शानदार अभिनय, साहिर लुधियानवी के गीत, एन दत्ता के संगीत के साथ-साथ पंडित मुखराम शर्मा की कहानी, पटकथा और डायलॉग दर्शकों के दिल पर छाप छोड़ने में सफल रही। इसका गीत 'न हिंदू बनेगा न मुसलमान बनेगा' और 'तेरे प्यार का आसरा चाहता हूं...' आज भी पसंद किए जाते हैं।
सर्वश्रेष्ठ कहानी सहित 'फिल्म फेयर अवॉर्ड' के लिए मिले थे चार नॉमिनेशन
फिल्म 'फिल्म फेयर अवॉर्ड' के मंच तक भी पहुंची। इसे चार नामांकन (नॉमिनेशन) मिले। पंडित मुखराम शर्मा को सर्वश्रेष्ठ कहानी, माला सिन्हा को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री, मनमोहन कृष्ण को सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता और साहिर लुधियानवी को सर्वश्रेष्ठ गीतकार का नामांकन मिला। बतौर सहायक अभिनेता मनमोहन कृष्ण इस अवॉर्ड को जीतने में सफल रहे। 'धूल का फूल' के बारे में इस तथ्य का जिक्र यशराज फिल्मस की वेबसाइट पर भी है।
पंडित मुखराम शर्मा का संक्षिप्त परिचय
पंडित मुखराम शर्मा का जन्म 30 मई 1909 को मेरठ के किला परीक्षितगढ़ क्षेत्र के गांव पूठी में हुआ था। वह हिन्दी और संस्कृत के विद्वान थे। एक मित्र ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें फिल्म लेखन में किस्मत आजमाने की सलाह दी। 1939 में मुम्बई पहुंचे और सबसे पहले महान फिल्मकार वी. शांताराम ने उन्हें काम किया।
बाद में कथा, पटकथा व संवाद लेखक के तौर पर स्थापित हुए। उन्हें बॉलीवुड का पहला स्टार राईटर कहा जाता है। उनका नाम फिल्मों के पोस्टरों और नंबरिंग (क्रेडिट) में प्रमुखता से दिया जाता था।

'धूल का फूल' के पोस्टर पर पंडित मुखराम शर्मा का नाम। सौ. सोशल मीडिया
उन्होंने 'धूल का फूल' के अलावा 'औलाद', 'साधना', 'वचन', 'दुश्मन', 'अभिमान', 'संतान', 'जीने की राह', 'हमजोली', 'मैं सुन्दर हूं', 'राजा और रंक', 'दो कलियां', 'नौकर' और 'सौ दिन सास' के आदि अनेक फिल्माें की कहानी लिखी। पंडित मुखराम शर्मा ने 25 अप्रैल 2000 को उन्होंने मेरठ में अंतिम सांस ली।
पंडित मुखराम शर्मा को मिले मिले अवाॅर्ड
- 1955: बेस्ट स्टोरी के लिए फिल्म फेयर अवाॅर्ड 'औलाद' के लिए
- 1956: बेस्ट स्टोरी के लिए फिल्म फेयर अवाॅर्ड 'वचन' के लिए
- 1959: बेस्ट फिल्म के लिए फिल्म फेयर अवाॅर्ड नॉमिनेशन संयुक्त रूप से 'तलाक' के लिए
- 1960: बेस्ट स्टोरी के लिए फिल्म फेयर अवाॅर्ड नॉमिनेशन 'धूल का फूल'
- 1961: संगीत नाटक अकादमी अवाॅर्ड
- 2000: जी सिने अवाॅर्ड फार लाइफटाइम अचीवमेंट
