मेरठ, जेएनएन। चिकित्सा विज्ञान ने गुर्दा प्रत्यारोपण की एक और जटिलता को खत्म कर दिया। मेरठ के चिकित्सकों ने ऐसे मरीज में गुर्दा प्रत्यारोपित करने में सफलता प्राप्त की, जिसमें एंटीबाडीज की मात्र बेहद ज्यादा थी। मरीज को इम्यूनोसप्रेशन-एंटीबाडी खत्म करने की दवा खिलाई गई। इस तकनीक से अब मेरठ में दूसरे ब्लड ग्रुप या जटिल मरीजों में भी गुर्दा प्रत्यारोपण किया जा सकेगा।

ब्लड ग्रुप अलग तो भी प्रत्यारोपण

वर्तमान में समान ब्लड ग्रुप में ही गुर्दा प्रत्यारोपण होता है। इसके लिए परिवार या रक्त संबंधों में से किसी की किडनी निकालकर प्रत्यारोपित की जाती है। ऐसे में दानदाताओं का लूप बेहद सीमित रह जाता है। किंतु तेजी से विकसित होती चिकित्सा तकनीक ने बड़ी उम्मीद जगाई है। बुलंदशहर निवासी मरीज सोहनवीर की पत्नी ने गुर्दा दिया। चिकित्सकों ने मरीज की जांच की तो पता चला कि एचएलए ह्यूमन ल्यूकोसाइट एंटीजन-यानी स्पेसफिक एंटीबाडी की मात्र ज्यादा थी। ऐसे में मरीज का गुर्दा प्रत्यारोपण फेल हो जाता है। गुर्दा रोग विशेषज्ञ डा. संदीप गर्ग यूरोलोजिस्ट डा. शालीन शर्मा व डा. शरतचंद गर्ग की टीम ने मरीज का दो बार प्लाज्मा फेरसिस किया।

शरीर से निकाल दिया एंटीजन

प्रत्यारोपण से 15 दिन पहले से मरीज को इम्यूनोसप्रेशन के इलाज पर रखा गया, जिससे शरीर नए गुर्दे के प्रति रिएक्शन न करे। जबकि सामान्य तौर पर ये दवा सिर्फ तीन दिन पहले शुरू की जाती है। इसके लिए मरीज को एटीजी इंजेक्शन दिए गए। अन्य दवाओं के जरिए रोगी के शरीर में मौजूद एंटीबाडी को खत्म किया गया। गुर्दा प्रत्यारोपण करने पर एक बार फिर नई चुनौती खड़ी हो गई। इम्यूनोसप्रेशन की दवाएं खिलाने से मरीज का फेफड़ा संक्रमित हो गया। पांच दिन तक मरीज की स्थिति गंभीर बनी रही, किंतु इलाज से संक्रमण रोक लिया गया। आखिरकार मरीज 14 दिनों बाद घर चला गया।

इन्‍होंने बताया

मरीज के शरीर में गुर्दा देने वाले के खिलाफ बड़ी संख्या में एंटीबाडी थी, जिससे प्रत्यारोपण के बाद गुर्दा खराब होने का खतरा था। प्लाज्मा फेरसिस की नई तकनीक से मरीज के शरीर के एंटीजन कणों को निकाल दिया गया। इम्यूनोसप्रेशन की दवाएं दी गईं। मरीज के शरीर की एंटीबाडी खत्म कर प्रत्यारोपण किया जो सफल रहा।

- डा. संदीप गर्ग, गुर्दा रोग विशेषज्ञ

ये मेरठ की बड़ी उपलब्धि है, जिसे हम किडनी ट्रांसप्लांट के सेमिनारों में प्रजेंट भी करेंगे। दोनों मरीज के ब्लड ग्रुप समान थे, किंतु मरीज के शरीर में एंटीबाडी ज्यादा थी। विशेष इंजेक्शन से एंटीबाडी न्यूट्रल की गई। ट्रांसप्लांट के बाद लंग्स में संक्रमण भी हुआ, किंतु उसे ठीक कर लिया गया।

- डा. शालीन शर्मा, मूत्र रोग विशेषज्ञ 

Posted By: Taruna Tayal

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