मेरठ, [संतोष शुक्ल]। कहते हैं दिल्ली का सियासी रास्ता यूपी और यूपी का रास्ता पश्चिमी यूपी से होकर गुजरता है। इस बार सूबे की सियासत पश्चिम उप्र के इर्द-गिर्द घूम रही है। किसान आंदोलन की गर्माहट के बीच नए राजनीतिक समीकरण उभर रहे हैं। कांग्रेस और रालोद को संजीवनी की तलाश है, वहीं आम आदमी पार्टी शहरी चोला उतारकर किसानों के बीच दाखिल हो गई है। सपा और बसपा की भी नजर पश्चिमी यूपी पर है। वहीं, चुनौतियों से जूझती भाजपा नया पैंतरा चलने की तैयारी में है।

सूबे में सियासी दखल और विकास की धारा बेशक पूर्वाचल के हिस्से ज्यादा रही है, लेकिन मुद्दों का कोटा पश्चिम उप्र ही भरता है। 2013 में मुजफ्फरनगर दंगों से उठी हवा ने राजनीतिक आबोहवा बदल दी थी। भाजपा को बड़ा फायदा मिला। इस बार भी पश्चिमी उप्र में सियासी चक्रवात बनने लगे हैं। कृषि कानून के विरोध का आंदोलन मेरठ, बागपत, मुजफ्फरनगर, शामली, बुलंदशहर से लेकर सहारनपुर और मुरादाबाद तक फैला हुआ है। भाकियू के प्रवक्ता राकेश टिकैत के आंसुओं से फिर से खड़ा होने वाला किसान आंदोलन पश्चिमी उप्र की राजनीतिक दिशा बदल चुका है। पंचायत चुनावों से साफ हो जाएगा कि पश्चिमी यूपी का मिजाज क्या है।

भाजपा की डगर कठिन

पश्चिमी उप्र में राजनीतिक उमड़ घुमड़ के बीच सत्ताधारी दल भाजपा संभलकर चल रही है। किसान आंदोलन की तपिश को लेकर शुरुआती दिनों में खामोशी के बाद भाजपा ने जाट नेताओं को किसानों के बीच उतारा। केंद्रीय मंत्री डा. संजीव बालियान लगातार किसानों के बीच हैं। प्रदेश सरकार के कैबिनेट मंत्री भूपेंद्र चौधरी, क्षेत्रीय अध्यक्ष मोहित बेनीवाल ने किसानों के बीच पहुंचकर उन्हें साधने का प्रयास किया, लेकिन बात बन नहीं पाई है। वहीं पार्टी का एक खेमा जाट चेहरे से इतर गन्ना मंत्री सुरेश राणा समेत दूसरे दिग्गज नेताओं को किसानों के बीच उतारने की पैरोकारी कर रहा है।

प्रियंका के लिए चुनौती में अवसर

कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका वाड्रा कृषि कानून के बहाने पंजे की ताकत बढ़ाना चाह रही हैं। सहारनपुर, बिजनौर, मुजफ्फरनगर और मेरठ में किसान महापंचायत कर पार्टी को फिर से खड़ा करने का प्रयास किया है। उनके निशाने पर सिर्फ मोदी और योगी सरकार है। प्रियंका बेशक पुराने तर्को के साथ भाजपा को घेर रही हैं, लेकिन उनके सम्मेलनों में पहुंची भीड़ ने पार्टी को आक्सीजन का नया झोंका जरूर दिया है। गठबंधन से पहले कांग्रेस सियासी उठापटक को भांप रही है। गत दिनों गाजीपुर बार्डर पर कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय सिंह लल्लू ने आंदोलन के सबसे बड़े चेहरे किसान नेता राकेश टिकैत से मुलाकात की। पार्टी का एक खेमा भाजपा को घेरने के लिए अंदरखाने रालोद से हाथ मिलाने की पटकथा लिख रहा है। गैर-भाजपा दलों ने जाट-मुस्लिम समीकरण को साधने पर फोकस किया है। कांग्रेस अन्य दलों में हाशिए पर चल रहे नेताओें को जोड़कर जनाधार बढ़ाने की भी तैयारी में है। उधर, सपा और रालोद में तालमेल बना हुआ है। सपा मुखिया अखिलेश यादव भी मार्च के अंतिम सप्ताह में किसान पंचायत करेंगे।

आप ने भी बदला गियर

राजनीति के चतुर खिलाड़ी अ‍रविंद केजरीवाल भी सूबे में पांव जमाने की तैयारी में हैं। विरोधी दल आप को शहरी पार्टी बता रहे हैं, लेकिन किसानों वाले सूबे पंजाब के विस चुनावों में पार्टी मजबूत होकर उभरी थी। हाल में सूरत में नगर निगम की 27 सीटों पर जीत से पार्टी का मनोबल बढ़ा है। लेकिन यूपी में संगठन को मजबूत किए बिना लखनऊ की डगर आसान नहीं होगी। हालांकि प्रदेश प्रभारी संजय सिंह ने संसद में किसानों का मुद्दा आक्रामक तरीके से उठाया। पश्चिम यूपी में किसानों के घर भी पहुंच रहे हैं।

पांच साल में बदल गया वेस्ट यूपी

2012 विस चुनावों में पश्चिमी उप्र की 136 सीटों में सपा ने 58, बसपा ने 39 और भाजपा ने 20 सीटों पर जीत दर्ज की थी। रालोद को नौ और कांग्रेस को आठ सीटें मिली थीं। लेकिन मुद्दों की गरमाहट से 2017 में पूरा सीन बदल गया।