अश्वनी त्रिपाठी, सहारनपुर। पश्चिम उप्र के चर्चित कस्बे देवबंद का जिक्र छिड़ते ही दिमाग में इस्लामिक छवि उभरने लगती है। इसका बड़ा कारण यहां स्थापित इस्लामिक शिक्षण संस्थान दारुल उलूम है। हालांकि, राजनीतिक मामलों में देवबंद का मिजाज जरा अलग है। बात राजनीति और नेतृत्व चुनने की हो तो यहां का मतदाता कभी भी धर्म, संप्रदाय और चेहरा देखकर वोट नहीं करता। 1951 से अब तक हुए विधानसभा चुनावों के नतीजे इसका प्रमाण हैं। इमरजेंसी के बाद जनता पार्टी के विधायक मौलाना उस्मान तथा 2016 उपचुनाव के विजेता माविया अली को अपवाद मान लें तो देवबंद ने हमेशा गैर मुस्लिम प्रत्याशी को वोट किया। यहां के लोगों ने किसी पाले में खड़े होने के बजाय हमेशा पसंदीदा पार्टी और प्रत्याशी को ही प्राथमिकता दी। उसे चुना जो उनकी बात करे, उनकी समस्याओं को सुने और उनके हल का प्रयास करे।

हर दल का खुला खाता

1951 के बाद देवबंद कांग्रेस का गढ़ रहा, तो इमरजेंसी के बाद 1977 में जनता पार्टी ने यहां कांग्रेस की जड़ें हिला दीं। 1980 से 1989 तक कांग्रेस काबिज रही। 1991 में जनता दल के ठा. वीरेंद्र सिंह ने कांग्रेस का रास्ता रोका। इसके बाद भाजपा की शशिबाला पुंडीर विधायक चुनी गईं। 1996 में सुखबीर सिंह पुण्डीर विधायक बने। 2002 में राजेन्द्र सिंह राणा ने यहां सपा का और 2007 में मनोज चौधरी ने बसपा का खाता खुलवाया। इसके बाद 2012 में फिर सपा और 2017 में पुन: भाजपा काबिज हुई।

नाम परिवर्तन की उठती रही मांग

भाजपा के देवबंद विधायक कुंवर ब्रजेश लगातार देवबंद का नाम बदलकर देववृंद करने की मांग कर रहे हैं। वह मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से भी नाम परिवर्तन की मांग कर चुके हैं। इस चुनाव में भी यह मांग उठेगी, लेकिन मतदाताओं के मन में इसका कितना असर होगा, यह अभी तय करना मुश्किल है।

एटीएस सेंटर भी नई पहचान

देवबंद की मौजूदा पहचान मुस्लिमों की शीर्ष धार्मिक शिक्षण संस्था दारुल उलूम से है। 30 मई 1866 में हाजी आबिद हुसैन व मौलाना कासिम नानौतवी ने इसकी स्थापना की। अब एटीएस कमांडो सेंटर के कारण भी देवबंद को पहचाना जा रहा है। यहां दो हजार वर्ग मीटर भूमि में एटीएस कमांडो सेंटर बनाया जा रहा है।

कई क्षेत्र महाभारतकालीन

इतिहासकार राजीव उपाध्याय यायावर के अनुसार, देवबंद क्षेत्र में रणखंडी गांव, पांडु सरोवर और बाला सुंदरी शक्तिपीठ आदि स्थान महाभारत कालीन हैं। पांडु सरोवर के बारे में मान्यता है कि यहीं पर यक्ष ने युधिष्ठिर से सवाल किए थे। बताते हैं कि प्राचीन काल में यह इलाका घने वनों से घिरा था। देवों के निवास के कारण इसे देववन कहा जाता था। इसके बाद इसे देववृंद कहा गया, फिर देवबंद हो गया।

सियासी मामलों में हम बेहद संजीदा

मोमिन कांफ्रेंस के नगर अध्यक्ष एडवोकेट नसीम अंसारी कहते हैं कि देवबंद की जनता सियासी मामलों में बेहद संजीदा है। वोट का प्रयोग निजी मत के आधार पर करती है। सियासी मामलों में देवबंद में किसी का दखल नहीं रहता। यही वजह है कि समय समय पर यहां अलग-अलग दलों के प्रत्याशी को विजय मिलती रही। देवबंद कभी किसी एक दल का ठिकाना बनकर नहीं रहा। यहां कांग्रेस, सपा, बसपा से विधायक चुने गए तो भाजपा के भी विधायकों को जनता ने चुनकर अवसर दिया।

श्री त्रिपुर मां बाला सुंदरी देवी मंदिर सेवा ट्रस्ट के अध्यक्ष पं. सतेंद्र शर्मा के अनुसार विकास की सोच रखने वाले प्रत्याशी को देवबंद की जनता ने हमेशा जाति, धर्म, सम्प्रदाय से ऊपर रखा। कभी किसी चुनाव में एक राय बनाकर यहां मतदान नहीं हुआ। सबने अपनी मर्जी से मतदान किया, इसीलिए हर बार यहां रोमांचक मुकाबला हुआ।

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1951 से 2017 तक देवबंद के विधायक

ठा. फूल सिंह आइएनसी

यशपाल सिंह निर्दलीय

ठा.फूल सिंह आइएनसी

पी सिंह आइएनसी

महावीर सिंह आइएनसी

महावीर सिंह आइएनसी

मो उस्मान जेएनपी

महावीर सिंह कांग्रेस

महावीर सिंह कांग्रेस

महावीर सिंह कांग्रेस

सुखबीर सिंह पुण्डीर भाजपा

शशि बाला पुंडीर भाजपा

वीरेंद्र सिंह जनता दल

राजेन्द्र सिंह राणा सपा

मनोज चौधरी बसपा

राजेन्द्र सिंह राणा सपा

माविया अली कांग्रेस

कुंवर बृजेश सिंह भाजपा

 

Edited By: Parveen Vashishta