मेरठ, [अमित तिवारी]। मेरठ की मिट्टी न सिर्फ ढेर सारी फसलें पैदा करती है, बल्कि देश के लिए कुर्बानी का जज्बा रखने वाले योद्धा भी देती रही है। जिले में एक ऐसा ही गांव है रासना। मेरठ शहर से महज 25 किलोमीटर पश्चिम में स्थित रासना गांव की मिट्टी ने न सिर्फ क्रांतिकारी पैदा किए, बल्कि आजादी की विरासत को संजोने के लिए भारतीय सेना को सैनिकों व अधिकारियों से भी नवाजा। आतंकी ऑपरेशन में वीरता का परिचय देने वाले इसी गांव के शहीद मेजर मोहित शर्मा को शांति काल में मिलने वाले सर्वोच्च सम्मान अशोक चक्र से नवाजा गया। गाजियाबाद में लोनी के पास राजेंद्र नगर मेट्रो स्टेशन का नाम शहीद मेजर मोहित शर्मा के नाम पर पड़ा।
अंग्रेजों के लिए डाकू, लोगों के लिए रॉबिनहुड
स्वतंत्रता संग्राम के दौरान साल 1852-57 के बीच सरधना तहसील के बूबकपुर गांव के एक डाकू ने अंग्रेजों को नाको चने चबवाए थे। उन्हें रॉबिनहुड की तरह गरीबों का मसीहा कहा जाता था। उनका नाम था झंडा सिंह। उनको रासना गांव में ही आसरा मिला था। यहां के चौ. हातिम सिंह उनके पनाहगार बने। आज भी गांव के जंगल में झंडा सिंह द्वारा स्थापित कुटी में दुर्गा माता का मंदिर है। यहां नवरात्र में सप्तमी को मेले का आयोजन होता है।
आजादी के मतवालों ने खूब छकाए थे अंग्रेज 
गांव के जंगल के बीच स्थित गांधी आश्रम देश के क्रांतिकारियों का अड्डा हुआ करता था। वर्तमान में यह श्री शालिगराम शर्मा स्मारक इंटर कॉलेज है। यहां के चौधरी सागर सिंह व उनके दोनों पुत्र ओम प्रकाश व परणाम सिंह के अलावा सेठ फूल सिंह, मास्टर सुंदरलाल छज्जू, जहारिया, मास्टर रघुवीर सिंह, मिट्ठू लाल, भिक्कन महाशय, काले, रतिराम, डालचंद व उमराव सिंह जैसे अनेक योद्धा हुए, जिन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलनों में हिस्सा लिया।
दो साथियों को बचाकर मारे थे चार आतंकी
मेजर मोहित शर्मा पुत्र राजेंद्र शर्मा ने 21 मार्च 2009 को जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा जिले के हफरूड़ा जंगल में आतंकवादियों से मुठभेड़ के दौरान अपने दो साथियों की जान बचाते हुए चार आतंकियों को मौत के घाट उतार दिया था। इस मुठभेड़ के दौरान वह बुरी तरह जख्मी हो गए थे और वीरगति को प्राप्त हुए। इसके लिए शहीद मेजर मोहित शर्मा को अशोक चक्र से नवाजा गया। जिले के वीरों को मिलने वाला अब तक का यह सर्वोच्च सम्मान है। उनकी पत्नी लेफ्टिनेंट कर्नल रिशमा शर्मा सेना की मेडिकल कोर में सेवारत हैं।
कारगिल के बाद भी जारी है सेवा
रासना गांव में सैन्य सेवा में जाने का सिलसिला वर्ष 1942 में हवलदार प्यारेलाल शर्मा ने शुरू किया। वह राजपूत रेजिमेंट में शामिल हुए थे। गांव के दो भाई लेफ्टिनेंट कर्नल अमरदीप त्यागी व लेफ्टिनेंट कर्नल राजदीप त्यागी वर्ष 1999 में कारगिल में ऑपरेशन विजय का हिस्सा रहे। लेफ्टिनेंट कर्नल अमरदीप ने पिछले साल सेवानिवृत्ति ली और अब युवाओं को योद्धा मिलिट्री एकेडमी के जरिए सेना के लिए तैयार कर रहे हैं। वहीं, लेफ्टिनेंट कर्नल राजदीप वर्तमान में जम्मू-कश्मीर के दुर्गम क्षेत्रों में कार्यरत हैं। इन स्वतंत्रता सेनानियों और सैन्य अफसरों के अलावा भी गांव से दर्जनों युवा सेना में कार्यरत हैं।

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