प्रसव के बाद पैरालिसिस, चार साल तक इलाज... बिस्तर से उठ दिखाया जज्बा और फिर एशियाड तक पहुंचीं स्वाति
प्रसव के बाद पैरालिसिस का सामना करने वाली स्वाति चौधरी ने चार साल के इलाज और संघर्ष के बाद तीरंदाजी ...और पढ़ें

जापान के नागोया में गुरुवार को रजत पदक जीतने के बाद पति गौरव के साथ स्वाति चौधरी। सौ. स्वजन
HighLights
प्रसव के बाद पैरालिसिस से जूझकर स्वाति ने दिखाई हिम्मत।
चार साल के इलाज और संघर्ष के बाद तीरंदाजी अपनाई।
एशियन पैरा गेम्स में रजत पदक जीतकर देश का मान बढ़ाया।
जागरण संवाददाता, मेरठ। जिंदगी में कभी-कभी एक हादसा इंसान की पूरी दुनिया बदल देता है। सपने अधूरे रह जाते हैं, जिंदगी बिस्तर तक सिमट जाती है और हर दिन एक नई चुनौती लेकर आता है। लेकिन अगर हौसला मजबूत हो और अपनों का साथ मिले तो मुश्किलों को भी मात दी जा सकती है। स्वाति चौधरी की कहानी इसकी मिसाल है।
प्रसव के बाद पैरालिसिस की गंभीर समस्या से जूझने वाली स्वाति ने कभी हार नहीं मानी। करीब पांच साल तक इलाज और संघर्ष के बाद उन्होंने तीरंदाजी को अपना लक्ष्य बनाया और अब एशियन पैरा गेम्स में रजत पदक जीतकर देश का मान बढ़ाया है।
स्वाति चौधरी की शादी पांच मार्च 2016 को गौरव चौधरी से हुई थी। पांच अक्टूबर 2017 को सिजेरियन डिलीवरी के बाद उनकी जिंदगी में ऐसा मोड़ आया, जिसने पूरे परिवार को झकझोर दिया। उनके भाई अंकुर चौधरी के अनुसार प्रसव के तीन-चार दिन बाद ही स्वाति के पैरों में लकवे जैसी स्थिति हो गई। जांच के दौरान ट्रांसवर्स मायलाइटिस की समस्या सामने आई, जिससे उनके शरीर का निचला हिस्सा प्रभावित हुआ।
बेटी नित्या स्वस्थ थी लेकिन मां स्वाति की जिंदगी अचानक अस्पतालों और इलाज के बीच सिमट गई। परिवार ने दिल्ली के वसंत कुंज स्थित स्पाइनल इंजरी सेंटर, मैक्स अस्पताल समेत कई जगह इलाज कराया। आइवीआइजी इंजेक्शन और प्लाज्माफेरेसिस जैसी उपचार प्रक्रियाएं भी अपनाई गईं। स्वाति पहले जैसी स्थिति में नहीं लौट सकीं। बीमारी के कारणों को लेकर परिवार को अलग-अलग चिकित्सकीय राय मिलीं लेकिन किसी एक कारण की पुष्टि नहीं हो सकी।
लंबे समय तक बिस्तर पर बीती जिंदगी
स्वाति के लिए शुरुआती चार-पांच साल बेहद कठिन रहे। स्वाति ने एमबीए की पढ़ाई की थी। वह आगे अंग्रेजी विषय में भी पढ़ाई करना चाहती थीं, लेकिन बीमारी ने उनकी जिंदगी की दिशा बदल दी। इस मुश्किल दौर में उनके पति गौरव चौधरी ने सबसे बड़ी ताकत बनकर साथ दिया। पेशे से साफ्टवेयर इंजीनियर गौरव ने पत्नी की देखभाल के लिए अपनी नौकरी तक छोड़ दी।
इलाज से लेकर रोजमर्रा की जरूरतों तक उन्होंने स्वाति का हर कदम पर साथ निभाया। स्वाति के भाई अंकुर कहते हैं कि गौरव ने जिस तरह दिन-रात एक करके बहन की देखभाल की वह हर किसी के लिए संभव नहीं है। परिवार के लिए वह दौर बेहद मुश्किल था, लेकिन पति का साथ स्वाति के संघर्ष की सबसे बड़ी ताकत बना।
कोच ने जगाई खेलों में आगे बढ़ने की उम्मीद
शहर के ही पैरालिंपियन तीरंदाज विवेक चिकारा ने स्वाती को खेलों में आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। वर्तमान में वह भारतीय खेल प्राधिकरण (साई) में प्रशिक्षण ले रही हैं। स्वाति का ससुराल जयदेवी नगर स्थित पंचवटी कालोनी में है। फिलहाल वह अपने परिवार के साथ मोदीनगर में रह रही हैं। उनके पति गौरव और बेटी नित्या इस सफर में उनके साथ हैं।
