मेरठ, जेएनएन। जीवनयापन के लिए अयोध्या से पिता राम केवल पांडेय के साथ सात साल की उम्र में डॉ. राम प्रकाश शास्त्री मेरठ तो आ गए थे लेकिन वहां मिले संस्कारों को आज तक नहीं भूले हैें। चौ. चरण सिंह विश्वविद्यालय से उपनिषदों में शिक्षा विषय पर संस्कृत में पीएचडी की। इसके बावजूद अपना जीवन प्रभु श्रीराम और श्रीकृष्ण की भक्ति में समर्पित कर दिया और कथा के जरिए राम का महत्व जन-जन को बता रहे हैं।

भागवताचार्य डॉ. राम प्रकाश शास्त्री शहर के शास्त्री नगर के सेक्टर दो में रहते हैं। उनका बचपन अयोध्या धाम में गुजरा। बाबा राम नारायण जी महाराज का सानिध्य मिला। बताते हैं- 40 साल पहले अयोध्या में श्री राम दरबार कनक भवन में लोग पंक्तिबद्ध होकर दर्शन को पहुंचते थे। पंचकोसी परिक्रमा को जनसैलाब उमड़ता था। तुलसी उद्यान, राजा जी का मंदिर, हनुमान गढ़ी, सीता रसोई आदि के प्रति अगाध श्रद्धा के चलते लोग अयोध्या धाम को अयोध्या जी कहकर पुकारते हैं।

एक प्रसंग छेड़ते हुए उन्होंने कहा कि जब लक्ष्मण ने लंका की खूबसूरती की प्रशंसा की तो प्रभु राम ने कहा था हे लक्ष्मण-यह सोने की लंका चाहे जितनी सुंदर हो लेकिन अयोध्या हमारी मातृ भूमि है और माता तो स्वर्ग से भी बढ़कर है। प्रभु श्रीराम का मंदिर बनने की सालों पुरानी मुराद पूरी हो गई।

राजकमल एन्क्लेव निवासी अयोध्यावासी पं. विनोद कुमार उपाध्याय और मेरठ में रह रहे अन्य अयोध्या वासी श्रीराम की जन्म भूमि से मिले संस्कारों को पश्चिम उप्र के लोगों के साथ साझा करते हैं।

सप्तपुरियों में पहला नाम अयोध्या जी का

पं. राम प्रकाश शास्त्री ने कवि रामधारी सिंह दिनकर की कविता सुनाते हुए अपने अयोध्या प्रेम को कुछ इस तरह बयां किया-

सुंदर होंगे देश बहुत से बहुत बड़ी ये धरती, पर अपनी मां तो अपनी है अमिट प्यार जो करती।

इच्छा है इस जन्मभूमि पर शत-शत बार जन्म लें हम,

शत-शत बार इसी की सेवा में अपना जीवन दें हम।

वह बताते हैं कि अयोध्या जी के बारे में प्रभु श्रीराम स्वयं मानस में कहते हैं-अति प्रिय मोंहि इहां के वासी। अयोध्या की महिमा में पूर्वाचल में कहावत है-गंगा बड़ी गोदावरी, तीरथ बड़ा प्रयाग। सबसे बड़ी अयोध्या नगरी, जहां प्रभु श्रीराम का अवतार। कहते हैं-सप्तपुरियों में सबसे प्रथम नाम अयोध्या जी का ही आता है।

Posted By: Jagran

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