मेरठ, जेएनएन। आजादी हमें यूं ही नहीं मिल गई। भारत ऐसे ही विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र नहीं बन गया। गुलामी की जंजीरों से निकलने का हौसला भारत में सबसे पहले 1857 में मेरठ ने ही दिखाया। वह कौन सी ताकत थी, जिसने कभी सूर्य अस्त नहीं होने वाले अंग्रेजी साम्राज्य के विरुद्ध खड़े होने का साहस मेरठ के सैनिकों को दिया था। इन सब सवालों का जवाब है कि मेरठ के सैनिकों के इरादों में भगवान शिव का प्रताप था। यह क्रांति यहां भगवान शिव की जटाओं से निकली थी। मेरठ में मंदिरों के नाम के सामने 'पलटन' शब्द लिखा जाना महज इत्तेफाक नहीं। दरअसल, आजादी के परवानों का इन मंदिरों से गहरा नाता रहा। भगवान शिव के सबसे बड़े त्योहार महाशिवरात्रि पर आपको बताते हैं ऐसे शिव मंदिरों के बारे में, जिन्होंने शिवभक्ति को राष्ट्रभक्ति में तब्दील कर दिया था। 
काली पल्टन...बाबा औघडऩाथ 
श्री बाबा औघडऩाथ शिव मंदिर प्राचीन सिद्धपीठ है। यहां स्थित शिवलिंग स्वयंभू है। फलप्रदाता और मनोकामना पूरी करने वाले औघड़दानी शिवस्वरूप हैं। इसी कारण इसका नाम औघडऩाथ शिव मंदिर पड़ा गया। इतिहासविद डॉ. अमित पाठक बताते हैं कि ब्रिटिश सेना की भारतीय 11वीं और 20वीं भारतीय पैदल सेना की लाइंस यहां थी। ये दोनों काली पलटन मंदिर में ही आकर मिलती थीं। आजादी से पहले अंग्रेज हमारे सैनिकों की टुकड़ी को दुर्भावनावश 'काली पलटन' कहा करते थे। सुरक्षा और गोपनीयता के लिहाज से अंग्रेजों ने यहां सेना का प्रशिक्षण केंद्र स्थापित किया था। भारतीय पलटनों के निकट होने के कारण इस मंदिर में सेनानी ठहरते थे और मंत्रणा करते थे। इनमें नाना साहेब भी थे। अपनी विजय यात्राओं के दौरान कई मराठा योद्धाओं ने यहां भगवान शिव की उपासना की। भारत के पहले स्वतंत्रता संग्राम में इस मंदिर का अहम योगदान रहा। एक जनश्रुति के अनुसार, मंदिर प्रांगण में स्थित कुएं पर सेना के जवान पानी पीने आते थे। बाग्लांदेश की आजादी के नायक रहे मेजर जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा ने इसी एतिहासिक कुएं पर शहीद स्मारक स्थापित किया था। ब्रह्मïलीन शंकराचार्य कृष्णबोधाश्रम ने 1968 में वेदमंत्रों के बीच मंदिर का शिलान्यास किया। 13 फरवरी 1972 को नई देव प्रतिमाएं लगाई गईं। 

सूरजकुंड: बाबा मनोहरनाथ मंदिर
बाबा मनोहरनाथ मंदिर सूरजकुंड भी क्रांति का एक प्रतीक है। यह मंदिर मेरठ में सूर्यतीर्थ (सूरजकुंड) के पूर्वी किनारे पर स्थित है। भगवान शंकर के अनन्य भक्त बाबा मनोहरनाथ मुगल बादशाह शाहजहां के समकालीन थे। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में भी इस मंदिर की भूमिका अहम रही। क्रांतिकारी बाबा मनोहरनाथ मंदिर में पूजा-अर्चना किया करते थे। इसके बाद ही वह अपनी रणनीति बनाते थे। आजादी के दीवानों की कई अहम रणनीतियां इसी मंदिर में बनी थीं। जब अंग्रेजी हुकूमत क्रांतिकारियों को निशाना बनाती थी तो कई बार उन्होंने यहीं शरण ली थी। इन सभी का उल्लेख अंग्रेजी हुकूमत के गजट में भी कई बार किया गया था। 10 मई, 1984 को मेरठ के तत्कालीन डीएम जोसेफ ने एक समारोह कराया था, जिसमें पूर्व सांसद शांति त्यागी सहित काफी लोगों ने भाग लिया था। मंदिर की पीठाधीश्वर गुरुमां नीलिमानंद महाराज बताती हैं कि यहां के तत्कालीन महंत क्रांतिकारियों और उनके परिवारों की हरसंभव मदद करते थे।
मंदिरों में शिवलिंग कैसे-कैसे?
मेरठ के मंदिर क्रांतिकारियों के कारण ही प्रसिद्ध नहीं रहे। यहां के शिव मंदिरों में विभिन्न धातुओं के शिवलिंग भी श्रद्धा के प्रतीक हैं।
राज-राजेश्वरी मंदिर: स्फटिक का शिवलिंग
गढ़ रोड स्थित राज-राजेश्वरी मंदिर स्फटिक शिवलिंग के कारण श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। हिमालय में हजारों साल तक जमी रहने वाली बर्फ स्फटिक में बदलती है। मंदिर की स्थापना 1990 में हुई थी। प्राण प्रतिष्ठा शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने कराई थी। स्फटिक का शिवलिंग शांति प्रदान करने वाला है।
दयालेश्वर महादेव मंदिर: पारद का शिवलिंग
मोहनपुरी स्थित दयालेश्वर महादेव मंदिर में पारद का 108 किलो का शिवलिंग स्थापित है। मंदिर के पुजारी श्रवण झा बताते हैं, यह उत्तर भारत में पारद का एकमात्र शिवलिंग है। बताया कि पारद शब्द में ‘प’ विष्णु, ‘अ’ कलिका, ‘र’ शिव और ‘द’ ब्रहमा का प्रतीक है। बताया कि काशी-प्रयाग जैसे तीर्थो का फल पारद शिवलिंग के पूजन मात्र से प्राप्त हो जाता है। जो भक्त श्रद्धाभाव से इसका पूजन करता है, उसकी सभी मनोकामना पूरी होती हैं। पारद शिवलिंग की उपासना से आयु, धन, आरोग्यता, मेधा, बल, रूप-लावण्य और यौवन में वृद्धि होती है।

यहां वास करते हैं देवों के देव महादेव
भगवान परशुराम की तपोभूमि पुरा महादेव (परशुरामेश्वर) पश्चिम उप्र में शिव भक्तों की आस्था का सबसे बड़ा केंद्र है। गांव पुरा स्थित यह मंदिर बागपत शहर से करीब 25 किमी. दूर है। यहां श्रवण व फाल्गुन मास में शिवरात्रि पर लाखों भक्त हरिद्वार से गंगाजल लाकर भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं। श्रवण माह में तो पैदल आने वाले लाखों कांवड़ियों का सैलाब उमड़ता है।
मंदिर का इतिहास
मंदिर के पुजारी जय भगवान शर्मा के अनुसार, मंदिर का इतिहास भगवान परशुराम से जुड़ा है। परशुराम जी ने पिता के आदेश पर अपनी मां रेणुका की हत्या का पश्चाताप करने के लिए कजरी वन या पुरा गांव में शिवलिंग की स्थापना कर तपस्या की थी। जिस स्थान पर शिवलिंग की स्थापना की, वहां एक मंदिर भी बनवाया। कालांतर में मंदिर खंडहर में बदल गया। एक दिन लंडौरा की रानी इधर से गुजरीं तो उनका हाथी वहां आकर रुक गया। कोशिशों के बाद भी हाथी नहीं हटा तो रानी ने इस स्थान की खोदाई कराने का आदेश दिया। खुदाई में शिवलिंग दिखा तो रानी ने यहां मंदिर बनवा दिया। यही शिवलिंग तथा इस पर बना मंदिर आज परशुरामेश्वर मंदिर के नाम से विख्यात है।
मंदिर में लगता हैं मेला
श्रवण व फाल्गुन माह में मंदिर परिसर में मेला मेले में श्रद्धालु हरिद्वार से जल लाकर भगवान आशुतोष का जलाभिषेक करते है। मंदिर प्रशासन तथा जिला प्रशासन भक्तों को तमाम सुविधाएं उपलब्ध कराता है।
-पंडित जयभगवान शर्मा। 

Posted By: Taruna Tayal

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