मेरठ, जागरण संवाददाता। 23 फरवरी को हस्तिनापुर में चालक की लापरवाही से नर्सरी की छात्रा स्कूल बस के अगले पहिए के नीचे आ गई और वहीं पर उसकी मौत हो गई। स्कूली बसों के संचालन को लेकर बरती जा रही लापरवाही के मुद्दे नजर सुप्रीम कोर्ट ने इस संबंध में मानक तय किए थे। बावजूद इसके इने गिने स्कूलों को छोड़ दें तो कहीं इसका अनुपालन होता नहीं दिख रहा है।

मानकों के विपरीत चल रही बसें

मेरठ संभागीय परिवहन कार्यालय में केवल 1285 स्कूली वाहन पंजीकृत हैं। बसों की इतनी कम संख्या से सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि अधिकांश बसें बिना रजिस्ट्रेशन के मानकों के विपरीत चल रही हैं। शहर की सीमा सटे इलाकों और मवाना, सरधना में बड़े पैमाने पर खटारा बसों का प्रयोग बच्चों को लाने ले जाने के लिए किया जा रहा है। एक अनुमान के अनुसार सड़कों पर चलने वाली कुल स्कूली बसों की संख्या 2500 से 2600 के आसपास है। अधिकांश बच्चे तो टैंपों और ई रिक्शा में जा रहे हैं जिन पर कोई कार्रवाई नहीं हो रही है।

ये बोले आरटीओ

हस्तिनापुर में छात्रा की मौत नहीं होती अगर बस में परिचालक या कोई स्टाफ मौजूद होता इसके साथ संभवत: साइड मिरर का प्रयोग भी चालक नहीं किया। तभी बच्ची पहिए के नीचे आ गई। आरटीओ हिमेश तिवारी ने कहा मानक के विपरीत स्कूल बसों के का संचालन किसी कीमत पर नहीं होने दिया जाएगा। अगर ऐसी बस चलती पाई जाती है तो सीज करने की कार्रवाई होती है। प्रवर्तन टीम को स्कूली वाहनों के खिलाफ समय समय पर अभियान चलाने के निर्देश दिए गए हैं।

ये हैं स्कूल बसों के संचालन के नियम

- वाहन का रंग पीले रंग का होना चाहिए।

- वाहन पर नीली पट्टी पर स्कूल का नाम लिखा हो।

- सभी वाहनों में ड्राइवर, कंडक्टर व महिला परिचारिका अनिवार्य।

- जीपीएस ट्रैकिंग सिस्टम होना चाहिए।

- बस के भीतर सीसीटीवी कैमरा होना चाहिए।

- बैठने की क्षमता वाहन क्षमता की डेढ़ गुना तक।

- 40 सीटर बस में 60 बच्चे तक बिठाए जा सकते हैं।

- बस की खिडकियों में क्षैतिज ग्रिल लगी हों जिससे बच्चे अंग बाहर न निकाल सके।

- वाहन में फस्ट एड बाक्स और अग्निशमन उपकरण लगे हों।

- सीट के पीछे पकड़ने के लिए बेल्ट लगी हो।

- बंद दरवाजों के अतिरिक्त दो इमरजेंसी द्वार होने चाहिए।

- बस में चढ़ने के लिए कोलेप्सेबल फुटस्टेप की व्यवस्था होनी चाहिए। 

Edited By: Prem Dutt Bhatt