मेरठ, [संतोष शुक्ल]। कोरोना मरीजों की मौतों का आंकड़ा भयावह स्तर छू गया। सितंबर में महज बीस दिनों में 110 मरीजों की मौत हो चुकी है। पहली बार किसी माह में कोरोना से मेडिकल कालेज में मरीजों की संख्या सौ पार हुई। शासन को भेजी गई रिपोर्ट के मुताबिक यहां पर रोजाना पांच से ज्यादा मरीजों की मौत हो रही है। कमिश्नर एवं जिलाधिकारी ने जहां मौतों का आंकड़ा रोकने के लिए हर मरीज की केस स्टडी के लिए कहा है, वहीं डाक्टरों की टीम कोमार्बिड फैक्टर पर शोध कर रही है। पता लगाया जा रहा है कि किन बीमारियों वाले मरीजों में मौतों का आंकड़ा ज्यादा रहा।

रेफर किए गए मरीजों से बिगड़ा आंकड़ा

लाला लाजपत राय मेडिकल कालेज में मई और जून में मौतों का आंकड़ा लखनऊ, कानपुर, आगरा एवं गोरखपुर मेडिकल कालेजों से ज्यादा था। सीएम योगी ने प्रमुख सचिव के अलावा पीजीआइ व केजीएमयू के डाक्टरों की टीम को भेजा। पता चला कि ज्यादातर मरीजों को मेडिकल कालेज अंतिम क्षणों में रेफर किया गया। मरने वालों में शुगर, किडनी, लंग्स, बीपी और कैंसर की बीमारियां थीं। इस समय तक रेमडेसिविर जैसी दवाएं और हाई फ्लो नेजल आक्सीजन जैसे उपकरण भी उपलब्ध नहीं थे। तत्कालीन मेडिकल प्राचार्य ने मंडलायुक्त अनीता मेश्राम को पत्र लिखकर गाजियाबाद और नोएडा से रेफर होकर आने वाले मरीजों पर रोक लगाने की मांग की। मंडलायुक्त ने गाजियाबाद, नोएडा व मुरादाबाद प्रशासन को साफ कहा कि वहां के गंभीर मरीजों का इलाज स्थानीय एल-3 केंद्र में किया जाए। जुलाई और अगस्त में मेडिकल में मरीजों की मौतों का आंकड़ा गिरने लगा।

निजी अस्पतालों ने भी केस बिगाड़ा

मेडिकल कालेज प्रशासन की रिपोर्ट के मुताबिक 13 सितंबर तक 60 से ज्यादा मरीजों की मौत में 40 रेफर होकर यहां भर्ती हुए थे। डाक्टरों के अनुसार उनके इलाज का मौका नहीं मिला। कई मरीजों की मौत एंबुलेंस से उतारकर भर्ती करने के बीच हो गई। प्राइवेट अस्पतालों में सांस की बीमारी के साथ भर्ती हुए मरीजों के फेफड़ों में निमोनिया फैल गया तो उन्हेंं मेडिकल भेजा गया। डीएम के. बालाजी ने आगाह किया है कि कोई निजी अस्पताल कोरोना के मरीजों का सिम्टोमेटिक इलाज का रिस्क न ले। ऐसे कई अस्पतालों को नोटिस जारी करने की तैयारी है। एक से 20 सितंबर तक 110 कोविड मरीजों की मौत हो चुकी है, जिसमें 77 मरीजों की जान भर्ती के होने के दो दिन के अंदर चली गई। भर्ती करने में इतनी देर हो चुकी थी कि इलाज के लिए कुछ बचा ही नहीं।

ये है कोविड मरीजों की मौतों का बड़ा कारण

- वायरस के खिलाफ शरीर में साइटोकाइन स्टार्म बनता है, जिससे अंग खराब होने से मरीज की जान चली जाती है।

- वायरस में रक्त में थक्का बनाने की प्रवृति होती है, जिससे हार्ट व ब्रेन स्ट्रोक से भी जान जाती है।

- फेफड़ों में सूजन बनने से आक्सीजन लेने की क्षमता तेजी से गिरती है, जिससे कई मरीजों की जान गई

- दोनों फेफड़ों में रुई के धब्बों की तरह निशान मिल रहे हैं, जो गहरा और जानलेवा निमोनिया है

- बीपी, शुगर, हार्ट, किडनी व सांस के मरीज मल्टीआर्गन फेल्योर में जल्द पहुंचते हैं।

एक से 20 सितंबर-110 मरीजों की मौत

- 77 की मौत-48 घंटे के अंदर

- 14 मरीजों की मौत-छह घंटे के अंदर

- 17 मरीजों की मौत-12 घंटे के अंदर

- 22 मरीजों की मौत-22 घंटे के अंदर

- 19 मरीजो की मौत-एक से दो दिन में

33 की मौत-48 घंटे के बाद

क्या कहते हैं प्राचार्य

70 फीसद मरीजों की मौत भर्ती होने के दो दिनों के अंदर हो गई। साफ है कि उनके इलाज का वक्त ही नहीं मिला। हम सभी मरीजों की केस स्टडी बना रहे हैं, जिसमें मौतों की वजहों का भी विश्लेषण होगा। दूसरी बीमारियों से जूझ रहे कोविड मरीजों के इलाज में खास सतर्कता बरती जाएगी। गंभीर मरीजों को तत्काल भर्ती करने का प्रयास होगा।

- डा. ज्ञानेंद्र सिंह, प्राचार्य, मेडिकल कालेज

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