मेरठ, [संतोष शुक्ल]। अगर आप वजन लेकर चलने में हांफ जाते हैं। सीढ़ी चढ़ने, दौड़ने में सांस तेजी से फूलने लगती है..तो फेफड़ों की जांच कराएं। संभव है कि फेफड़ा वायु प्रदूषण की भेंट चढ़ रहा हो। क्रिटिकल केयर चिकित्सकों का कहना है ब्रंकोडायलेटर दवा से मरीजों के फेफड़ों की जांच में खतरनाक पहलू सामने आ रहे हैं। लंग्स की सिकुड़ चुकी छोटी पाइपों के इलाज में दवाएं नाकाम हैं। मरीजों के फेफड़ों का ऑक्सीजन बैंक छह लीटर से घटकर 3.5-4 लीटर तक रह गया है। उधर, निमोनिया में सेकंडरी इंफेक्शन से कई की जान चली गई।

सांस के पाइप की लाइनिंग बिगड़ी

विशेषज्ञों का कहना है कि बड़े कणों को नाक का म्यूकोसा रोक लेता है, लेकिन पीएम 1 और पीएम 2.5 लंग्स के अंदर सांस की सूक्ष्म पाइपों में सूजन बनाते हैं। मेरठ में क्रिटिकल केयर विशेषज्ञ डा. अवनीत राणा कहते हैं कि इन पाइपों की लाइनिंग बिगड़ रही है। बाद में ये सिकुड़ जाती है, जो ठीक नहीं हो सकती। पीएम2.5 के साथ हेवी मेटल शरीर में पहुंचकर कैंसर की वजह भी बनते हैं।

बीमारी से लड़ने में करती है मदद

वयस्क व्यक्ति के फेफड़े में छह लीटर ऑक्सीजन स्टोर हो सकती है। ये बीमारी से लड़ने में मदद करती है। किंतु प्रदूषण से ऑक्सीजन रोकने की क्षमता सिर्फ 3.5 से चार लीटर तक रह गई है। इसकी वजह से आइसीयू में पहुंचने पर मरीज की रिकवरी नहीं हो पा रही है। सेकंडरी इन्फेक्शन से कई मरीज जान गंवा चुके हैं। शरीर में सीओटू की मात्र बढ़ी रहने से थकान, दर्द, चिंता, स्मृति लोप, व सांस फूलने के लक्षण उभरते हैं।

दुनिया में सबसे खराब हवा हमारी

डब्ल्यूएचओ ने हवा में पीएम2.5 का मानक 15 तय किया है। यूरोपीय देशों में 30, जबकि भारत में 60 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक तक बर्दाश्त किया जाता है। किंतु दिल्ली-एनसीआर में सर्दियों में औसत मात्र 150 माइक्रोग्राम से ज्यादा दर्ज हुई। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने भी माना है कि पीएम 2.5 का स्तर 400 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर पहुंचने से शरीर में रोजाना 20 से ज्यादा सिगरेट का धुआं पहुंच रहा है। रोजाना 23 हजार बार सांस लेने से फेफड़ों में बड़ी मात्रा  में सल्फर, नाइट्रोजन, कार्बन डाई आक्साइड, कार्बन मोनोआक्साइड एवं ओजोन जमा हो चुकी है।

इनका कहना है

पल्मोनरी लंग्स टेस्ट में बड़ी संख्या में मरीज फेल हो रहे हैं। पीएम 2.5 से लंग्स की लाइनिंग डैमेज होती है। जिसे दवाओं से भी रिपेयर नहीं किया जा सकता। ऐसे मरीजों में निमोनिया व सेकंडरी संक्रमण तेजी से पकड़ता है। अस्थमा व सीओपीडी के मरीजों में अटैक का खतरा बढ़ा है।

- डा. संतोष मित्तल, सांस रोग विशेषज्ञ, मेडिकल कालेज

पीएम 2.5 के सूक्ष्म कण लंग्स की सूक्ष्म पाइपों में चिपककर फिर नहीं निकलते हैं। अर्बन क्षेत्र के मरीजों के फेफड़ों में ऑक्सीजन का रिजर्व 40-50 प्रतिशत कम मिल रहा है। अस्पताल में भर्ती होने पर न सीओटू बाहर निकाल पाते हैं, और न ऑक्सीजन मेंटन करते हैं। आइसीयू में सेकंडरी इन्फेक्शन से मौतें बढ़ी हैं।

- डा. अवनीत राणा, क्रिटिकल केयर विशेषज्ञ 

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