मेरठ, जेएनएन। पितृ पक्ष का आज अंतिम दिन है। अमावस्या के दिन किए जाने वाले श्राद्ध का विशेष महत्व है। इस दिन पितृ पक्ष के दौरान होने वाली भूल-चूक के लिए क्षमा याचना की जाती है। पितृ विसर्जनी अमावस्या को लेकर विद्वानों ने राय जाहिर की है।

हर सनातन धर्मी को करना चाहिए तर्पण

आदर्श नगर के पंडित गणेश ठाकुर के अनुसार हर सनातन धर्मी को पितृ पक्ष में पूर्वजों का श्राद्ध और तर्पण करना चाहिए। पूर्वजों को मन से स्मरण करना चाहिए और परमपिता परमेश्वर से उनकी उच्च स्थिति के लिए प्रार्थना करनी चाहिए। निर्णय ङ्क्षसधु के अनुसार पितृ लोक से मृत्यु लोक में आए पूर्वज अश्विन कृष्ण पक्ष अमावस्या को लौट जाते हैं। 16 दिनों तक जिस प्रकार हम उनके निमित्त तर्पण आदि करते हैं उससे वह प्रसन्न होते हैं और आशीर्वाद देते हैं। पितृ पूजा को शास्त्रों में देव पूजा से ज्यादा महत्व दिया गया है। पितरों की पूजा से लाभ, सुख, समृद्धि और यश की प्राप्ति होती है। इस अवधि में शास्त्रों में खरीदारी निषेध नहीं है।

जरूरतमंदों को दान

कंकड़खेड़ा के आचार्य मयंक मिश्र ने बताया कि 17 सितंबर को ऐसे पूर्वजों का श्राद्ध कर्म किया जा सकता है, जिनकी तिथि हमें ज्ञात नहीं है। अंतिम दिन हमें पूर्वजों के प्रति कल्याण का भाव रखते हुए श्राद्ध करना चाहिए। ब्राह्मणों को भोजन कराते हुए जरूरतमंदों को दान देना चाहिए। पितृ पक्ष में विवाह, मुंडन संस्कार जैसे आयोजन निषेध माने जाते हैं। इसके पीछे उद्देश्य यह है कि वर्ष में 16 दिन हम अपने पूर्वजों के निमित्त निकालें। हम दूसरे आयोजनों में व्यस्त रहेंगे तो पूर्वजों का ध्यान नहीं कर पाएंगे। इसी तरह नई वस्तुओं की खरीदारी भी निषेध नहीं है। जरूरी है तो हम आभूषण, वाहन, भूमि और मकान और वस्त्र भी खरीद सकते हैं। श्राद्ध के मूल में श्रद्धा है। पूर्वजों के प्रति श्रद्धा भाव रखना ही इस पक्ष का मर्म है।

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