मेरठ, जेएनएन। सैनिक छावनियों के आसपास सेना से जुड़े फर्जी कागजातों को बनाने का गिरोह लंबे समय से सक्रिय रहा है। समय-समय पर ऐसे गिरोह के लोग पकड़े भी गए हैं। इसी कड़ी में छावनी स्थित सेना की मिलिट्री इंटेलिजेंस टीम ने सिविलियन के लिए सेना के फर्जी पेंशनर कागजात बनाने वाला गिरोह पकड़ा है। यह गिरोह देहरादून में पकड़ा गया जो एक कागजात बनाने के लिए 50 से 60 हजार रुपये लेते थे। मिलिट्री इंटेलिजेंस टीम ने प्राथिमक तौर पर पांच लोगों को पकड़ कर एसटीएफ के हवाले किया। प्राथमिक जांच के बाद दो लोगों को छोड़ दिया गया और तीन को गिरफ्तार कर लिया गया है। गिरफ्तार लोगों में रघुवीर सिंह, विक्की थापा और भैरवतदत्त कोटनाला हैं। इनके पास से काफी अधिक मात्रा में पूर्व सैनिकों के फर्जी कागजात और आर्मी रबर स्टैंप मिले हैं, जिससे यह लोग फर्जी कागजात बनाया करते थे। 

विदेशों में नौकरियों के जाल से जुड़ा है यह फर्जीवाड़ा

फर्जी कागजातों को बनाने का यह गोरखधंधा विदेशों में नौकरी भेजने वाले बड़े रैकेट से भी जुड़ा हुआ है। इन कागजातों का इस्तेमाल सिविलियन को गल्फ देशों में नौकरी दिलाने के लिए तैयार किया जाता है। खाड़ी देशों से अफगानिस्तान सहित आसपास के देशों में नौकरी के लिए इन्हें भेजा जाता है। मेरठ छावनी और देहरादून के आसपास के क्षेत्रों में हजारों की संख्या में पूर्व सैनिक रहते हैं। क्षेत्र से बहुत से लोग दूसरे देशों में नौकरी के लिए आना-जाना भी करते हैं। मोटी रकम लेकर पूर्व सैनिकों की तर्ज पर फर्जी पेंशन कागजात बनाकर उन्हें विदेशों में नौकरी के लिए भेजा जाता है।

42 साल की उम्र तक  सेवा और फिर सेना के नाम पर फर्जीवाड़ा

पूर्व सैनिकों की तर्ज पर फर्जी कागजात बनाने वाले इस गिरोह में एक पूर्व सैनिक भी शामिल हैं। रघुवीर सिंह देहरादून के राजपुर में जोहड़ी गांव के रहने वाले हैं। 65 वर्षीय रघुवीर सिंह को पाल के नाम से जाना जाता है। वह 2006 में सेना के सप्लाई डिपो देहरादून से सेवानिवृत्त हुआ। 42 साल की उम्र तक सप्लाई डिपो में रहते हुए सेना को सेवाएं दी और अब सेना के नाम पर ही फर्जीवाड़े का धंधा शुरू कर दिया। 2008 से 2013 तक जोहड़ी गांव के उपप्रधान भी रहे और पिछले 2 साल से वह बेटे संजय छेत्री के साथ फर्जीवाड़े के धंधे को आगे बढ़ा रहे थे। संजय छेत्री भी पूर्व सैनिक है और सेना में लंबे समय तक कार्यरत रहा है। उन्होंने अपनी सेवाएं देने के बाद पिता के साथ इस गोरखधंधे में साथ दिया। उनके साथ विकी थापा देहरादून के दूधली बडकली का रहने वाला है और प्रिंटिंग प्रेस संचालक भैरव दत्त कटनाला पंचायत भवन रोड बंजर वाला का रहने वाला है। यह रघुवीर का करीबी भी बताया जाता है। दीपक भी इन लोगों के साथ इस काम में शुरू से ही जुड़ा हुआ है जो ऐसे लोगों को ढूंढता था जो बाहर जाकर नौकरी करना चाहते थे।

सेना में सेवा और सेना के नाम पर ही फर्जीवाड़ा

फर्जी कागजात बनाने के इस गिरोह में एक पूर्व सैनिक भी शामिल हैं। रघुवीर सिंह देहरादून के राजपुर में जोहड़ी गांव के रहने वाले हैं। 56 वर्षीय रघुवीर सिंह को पाल के नाम से जाना जाता है। वह 2006 में 42 साल की आयु में रघुवीर सेना के सप्लाई डिपो देहरादून से सेवानिवृत्त हुआ। 2008 से 2013 तक जोहड़ी गांव के उपप्रधान भी रहे और पिछले 2 साल से वह बेटे संजय छेत्री के साथ फर्जीवाड़े के धंधे को आगे बढ़ा रहे थे। संजय छेत्री भी पूर्व सैनिक हैं। इनके साथ विकी थापा देहरादून में क्लेमनटाउन के दूधली बडकली का रहने वाला है। प्रिंटिंग प्रेस संचालक भैरव दत्त कटनाला है जो पटेल नगर में पंचायत भवन रोड बंजारावाला निवासी है। यह रघुवीर का करीबी भी बताया जाता है। वहीं दीपक और संजय क्षेत्री को प्राथिमक जांच के बाद छोड़ दिया गया है।

आइएसआइ लिंक भी तलाश रही एजेंसियां

सेना की खुफिया एजेंसी के साथ ही एसटीएफ भी इस रैकेट में गल्फ देशों के रैकेट की मिलीभगत के साथ ही पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आइएसआइ का लिंक भी तलाश रही है। पिछले दिनों हापुड़ से सिगनल रेजीमेंट के एक पूर्व सैनिक को पाकिस्तान के लिए जासूसी करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। ऐसा माना जा रहा है कि पूर्व सैनिकों के कागजातों का इस्तेमाल असल में पूर्व सैनिकों से मेलजोल बढ़ाने के लिए भी किया जा सकता है। उसके जरिए धीरे-धीरे उनको अपने झांसे में लेकर सेना की खुफिया जानकारी एकत्र करने की साजिश भी हो सकती है। पूर्व सैनिक द्वारा पाकिस्तान को सूचनाएं भेजने का मामला बेहद ताजा है और पश्चिमी यूपी से ही जुड़ा हुआ है, जो मेरठ छावनी के अंतर्गत ही आती है।

फर्जी कागजात पर पेंशन लेने की अब तक पुष्टि नहीं

जांच में अभी तक इन फर्जी कागजातों पर  पेंशन लेने की पुष्टि नहीं हुई है। सेना की पेंशन व्यवस्था में एक सैनिक से संबंधित भर्ती होने से पहले के कागजातों के साथ उनकी सेवा काल के हर विवरण कागजातों पर दर्ज होते हैं। इसलिए इस व्यवस्था में फर्जी कागजात घुसा पाना लगभग मुमकिन नहीं है। फिर भी जो भी फर्जी कागजात जिन भी विभागों से संबंधित मिले हैं, उन विभागों को नामों की सूची देकर सूचित किया जाएगा। यह भी संभव है कि सेना के फर्जी कागजात तैयार करने के लिए पूर्व सैनिकों के नाम और उनकी सेवा विवरण का इस्तेमाल भी किया गया हो। इसलिए कागजातों की जांच विभागों तक भी की जा सकती है। 

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