किसी शहर के विकास का आकलन उसके इन्फ्रास्ट्रक्चर से होता है। इसे सरकार सीधे तौर पर या उसके निकाय अपने स्तर से मुहैया कराते हैं। वहीं कुछ ऐसे लोग भी होते हैं, जो शहर के इन्फ्रास्ट्रक्चर में अहम भूमिका निभाते हैं। उनके कार्य, उनकी सलाह और उनकी योजनाएं विकास के रुके हुए पहिए को गति दे देती हैं। गति देने वाले ऐसे लोगों को दैनिक जागरण माय सिटी माय प्राइड महाभियान के तहत रूबरू कराता है। ऐसे ही एक एक्सपर्ट हैं जागेश कुमार।

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जागेश कुमार पेशे से आर्किटेक्ट हैं और मेरठ विकास प्राधिकरण के मुख्य नगर नियोजक रहे हैं। उन्होंने शहर के लिए विकास का खाका तैयार किया था, जिसे वर्तमान में लागू न होने पर दुखी हैं। उनके समय में पल्लवपुरम, वेदव्यासपुरी जैसी आवासीय योजना धरातल पर पहुंचाई गई। मगर उनके बाद एमडीए की आवासीय योजनाओं को परिवहन सुविधाओं से नहीं जोड़ा गया।

वह चाहते हैं कि जो भी सिटी बसाई जाए उसे परिवहन सुविधा से जरूर जोड़ा जाए। उन्होंने सरकार को सलाह दी थी कि स्माल मीडियम टाउन को शहर की तरह विकसित करने पर ध्यान देना चाहिए। तभी शहरों पर बोझ कम होगा। गांव के लोगों को गांव में ही रोजगार और उद्यम के साधन मुहैया कराने होंगे, तभी शहर की ओर पलायन रुकेगा।

यही नहीं शहर के उद्यमियों, चिकित्सकों, स्कूल प्रबंधकों को भी सब्सिडी और छूट वाली योजनाएं देनी चाहिए, जिससे वे गांव की तरफ जाएं। वहां विकास कार्य में सहयोग करें। जब तक अर्बन विकास योजना पर ध्यान नहीं दिया जाएगा तब तक गांव और शहर दोनों अपनी-अपनी जगह परेशान और तंग रहेंगे।

दिल्ली का दबाव कम करने के लिए एनसीआर प्लानिंग बोर्ड 1962 में बना था, लेकिन इस पर ध्यान नहीं दिया गया। मेरठ जैसे शहर को इसका सहभागी नहीं बनाया गया, इसीलिए तमाम सुविधाएं और संसाधन होने के बाद भी दिल्ली जस की तस है। अब भी दिल्ली पर ही पूरी तरह से निर्भरता है।

विकास की योजनाएं और उसे लागू करने पर कभी विधिवत काम नहीं हुआ तभी तो मेरठ से दिल्ली तक सड़क के किनारे उद्योग या कालोनियां बसीं, लेकिन उसके पीछे पूरा क्षेत्र वीरान नजर आता है। प्लानिंग का कार्य शून्य है। इसीलिए हम पीछे जा रहे हैं।

जागेश कुमार को लगता है कि शहर के इन्फ्रास्ट्रक्चर में कई दिक्कतें हैं। फिलहाल वह पांच दिक्कतों को बताते हैं, जिस पर सुधार हो तो इन्फ्रास्ट्रक्चर में बदलाव आ सकता है।

1. प्लानिंग पर दिया जाए ध्यान: उनका कहना है विकास प्राधिकरण हो या फिर आवास विकास किसी ने प्लानिंग पर ध्यान नहीं दिया। सभी अपने-अपने विभागीय कार्य में लगे रहते हैं। इन्हें मिलाकर किसी ने पूरे शहर के लिए प्लान नहीं बनाया। इसीलिए शहर समस्याओं से ग्रस्त है। यदि प्लानिंग पर कार्य नहीं होगा तो शहर इसी तरह से समस्याओं से जूझता रहेगा।

2. कूड़ा प्रबंधन: उनका कहना है कि शहर की बड़ी दिक्कतों में कूड़ा प्रबंधन न होना भी है। इसमें कार्य नहीं होगा तो शहर में अवसर कम होते जाएंगे। कूड़ा शहर का पर्यावरण बिगाड़ रहा है। इसकी वजह से शहर स्वच्छता मिशन और स्मार्ट सिटी से बाहर हुआ। यही हाल रहा तो यह शहर रहने योग्य शहर भी नहीं रह जाएगा।

3. ट्रेंड और टेक्निकल स्टाफ: प्राधिकरणों में ट्रेंड और टेक्निकल स्टाफ नहीं हैं। एक उदाहरण देखिए, नगर निगम के पास सफाई का कार्य नगर स्वास्थ्य अधिकारी देख रहे हैं, जबकि इसके लिए एनवायरमेंट एक्सपर्ट होना चाहिए। यही स्थिति सभी विभागों में है। पद से संबंधित ट्रेंड स्टाफ नहीं है। स्किल इंडिया के तहत स्टाफ को भी स्किल वाला बनाना होगा।

4. गोबर प्रबंधन: शहर में सबसे बड़ी समस्या गोबर बनता जा रहा है। हर कोई अपने घर में दुधारू पशु रखना चाहता है। शहर के अंदर डेयरियां भी हैं। मगर गोबर प्रबंधन जरूरी है। घर से गोबर उठाने उसे खाद बनाने या अन्य कार्य में उपयोग करना होगा। इसमें रोजगार सृजन भी किया जा सकता है। मगर इस पर भी किसी ने ध्यान नहीं दिया।

5. कनेक्टिविटी: शहर हो या गांव उसकी सबसे बड़ी समस्या कनेक्टिविटी है। इन्फ्रास्ट्रक्चर के विकास में कनेक्टिविटी की भूमिका होती है। मेरठ शहर में वेदव्यासपुरी जैसी तमाम कालोनियां हैं, जो नेटवर्क से बाहर हैं। वहां कनेक्टिविटी नहीं है। "
- जागेश कुमार


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By Krishan Kumar