चिकित्सक को मरीज आज भी धरती के भगवान के रूप में देखना चाहता है, फिर भरोसे का रिश्ता क्यों दरक रहा? अस्पताल मनमाना बिल बनाते हैं या फिर मरीज सब्र खो रहा है। भारत दुनिया की तेजी से बढ़ती इकोनॉमी है तो जीडीपी का स्वास्थ्य सेवाओं पर सिर्फ डेढ़ फीसद ही क्यों खर्च? हर व्यक्ति को चिकित्सा बीमा कवर कब मिलेगा?

दैनिक जागरण के 'माय सिटी-माय प्राइड' कार्यक्रम के अंतर्गत आयोजित राउंड टेबल कांफ्रेंस में चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े उक्त सभी विषयों पर संजीदगी से मंथन हुआ। समाधान के तमाम रास्ते खुलते गए। डॉक्टरों और उद्यमियों ने हाथ मिलाकर वंचित वर्ग तक स्तरीय चिकित्सा पहुंचाने की शपथ ली। आइएमए सस्ती दवाएं, एंबुलेंस व ब्लड बैंक के साथ ही महिलाओं की भी विशेष क्लीनिक संचालित करेगा।

जागरण कार्यालय में चिकित्सा व्यवस्था पर उच्च स्तरीय विचार विमर्श का गवाह बना। मेडिकल कॉलेज के पूर्व प्राचार्य व वरिष्ठ नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. संदीप मित्थल और वरिष्ठ कार्डियोलाजिस्ट डॉ. राजीव अग्रवाल ने राउंड टेबल कांफ्रेंस का संक्षेप में सार पेश किया। दोपहर 12 बजे से शुरू कार्यक्रम में इलाज को सस्ता व सुलभ बनाने के लिए तर्क-वितर्क का भी दौर चला।

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इंडियन इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के पूर्व चेयरमैन एएन मलहोत्रा ने कहा कि मेरठ में योग्य डॉक्टरों की भरपूर उपलब्धता के बावजूद मरीजों से लूटपाट जैसे हालात हैं। डॉ. सुधी कांबोज ने मरीज-डॉक्टर के बीच भरोसे का संबंध बनाने पर जोर दिया। डॉ. वीरोत्तम तोमर ने कहा कि मरीज दिल्ली जैसा इलाज तो चाहता है, किंतु इसका खर्च बढ़ने पर बिल देते वक्त लूट की बात कहने लगता है। कहा कि मेरठ में अस्पताल मरीज को भर्ती कर लेते हैं, जबकि मेट्रो शहरों में एडवांस भुगतान लेने के बाद ही करते हैं।

धर्मार्थ चिकित्सालय अब कहां?
आइएमए के पूर्व अध्यक्ष डॉ. तनुराज सिरोही ने कहा कि अगर अस्पताल को एनएबीएच मानक दिया जाए तो इलाज का खर्च और बढ़ जाएगा। धर्मार्थ चिकित्सालयों की कमी पर भी चिंता जताई गई। कहा गया कि इसकी जगह कॉरपोरेट लेते जा रहे हैं। इस बीच सदन इस बात पर सहमत हुआ कि आपसी सहभागिता से कारपोरेट अस्पताल संचालित किया जा सकता है।

डॉ. सदीप मित्थल ने कहा कि मरीज कई बार डॉक्टर से भावनात्मक संबंध रखता है, ऐसे में वो कहीं से भी इलाज के लिए वहीं पहुंचेगा। उन्होंने दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल के मोहल्ला क्लीनिक की तारीफ करते हुए इस कॉन्सेप्ट को अपनाने की सीख दी। प्राथमिक एवं सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र को अपडेट रखना होगा।

फैमिली फिजीशियन फिर से अपनाएं
डाक्टरों ने माना कि समाज में बढ़ते अविश्वास से लोगों के बीच से फैमिली फिजीशियन का कॉन्सेप्ट खत्म हो चुका है। इससे परिवार का हर सदस्य न सिर्फ सीधी निगरानी में होता है, बल्कि जटिल रोगों के इलाज से पहले सटीक काउंसलिंग हो जाती है। डॉ. संदीप ने कहा कि सुपरस्पेशलिटी कॉरपोरेट का बिजनेस टूल है।

डॉ. सुनील जिंदल ने चिकित्सकों के प्रति जनता के मन में बढ़ती असहिष्णुता को खतरनाक बताया। कहा कि रात को इमरजेंसी में भर्ती करने वाला डॉक्टर मरीज के ठीक होते ही उनकी नजर में दुर्भाग्यजनक रूप से खलनायक बन जाता है। डॉ. उमंग अरोड़ा ने कहा कि प्रशासन भयमुक्त माहौल दे तो मेरठ दिल्ली के आसपास का सबसे बेहतर मेडिकल हब बनेगा।

फाइलों में उलझे हैं सरकारी डॉक्टर, इलाज कब करें
डॉ. राजीव अग्रवाल ने हर क्षेत्र में मौलिक सुधार की जरूरत पर बल दिया। कहा कि सीएमएस एवं सीएमओ समेत तमाम सरकारी डॉक्टर दिनभर प्रशासन की मीटिंग में व्यस्त रहते हैं, फिर इलाज कौन करेगा? अगर डॉक्टरों को गांवों में सर्विस के लिए भेजा जाता है तो आईआईएम से पढ़ने वालों को भी पल्स पोलिया समेत तमाम कार्यक्रमों में ग्रामीण क्षेत्रों में उतारने की जरूरत है।

उधर, पैनल के मरीजों के इलाज का खर्च कई माह बाद मिलता है, जिससे अस्पतालों का अर्थतंत्र गड़बड़ा जाता है। उन्होंने प्रश्न उठाया कि मेरठ के ईएसआई के मरीज को परमिशन के लिए सहारनपुर क्यों भटकना पड़ता है। आखिर यह व्‍यवस्‍था मेरठ में ही क्‍यों नही दी जाती। उन्‍होंने यह भी मुद्दा उठाया कि अगर कोई किसी का चिकित्‍सा बीमा कराता है तो उसे टैक्‍स में छूट दी जानी चाहिए। फिजीशियन डॉ. संदीप जैन ने भी पैनल के मरीजों से जुड़ी समस्याओं पर फोकस किया।

पैनल से जल्द भुगतान तो मिले
फिजीशियन डॉ. तनुराज सिरोही ने कहा कि सरकार की ओर से भुगतान में ढिलाई देखते हुए तमाम कॉरपोरेट अस्पतालों ने मोदीकेयर को मना कर दिया। लघु उद्योग भारती के राजकुमार शर्मा ने कहा कि व्यवस्था से जुड़ी समस्याओं को मंडलायुक्‍त से लेकर मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ के पास तक भेजा जाएगा।

बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. दिव्या बंसल ने जेनरिक दवाओं का मुद्दा उठाया। कहा कि इस बहाने दवाओं की गुणवत्ता से समझौता नहीं होना चाहिए। उन्‍होंने गरीब तबके के लोगों को बीपीएल से जोड़ने और इसके तहत मिलने वाली सुविधाओं के प्रति उन्‍हें जागरूक करने पर बल दिया।

डॉ. तनुराज ने चिंता जताई कि क्लीनिकल इस्टैबलिशमेंट एक्ट आया तो धीरे-धीरे व्यक्तिगत क्लीनिक बंद करनी पड़ेंगी। इस बीच डॉक्टरों ने उद्यमियों के सहयोग से मेडिकल बैंक बनाने पर भी चर्चा की।

दवा व्यापारी रजनीश कौशल और मनोज शर्मा ने जन सरोकार के लिए उठाए जा रहे विशेष कैंप या जरूरतमंद मरीजों को भरपूर मदद देने की बात कही। विमर्श में यह भी निकलकर सामने आया कि एंबुलेंस सेवा भी तीन से चार सौ रुपए में उपलब्ध कराई जा सकती है। डॉ. जिंदल ने कानून व्यवस्था की ओर ध्यान खींचा। कहा कि नर्सिंग होम और क्लीनिकों में तोड़फोड़ पर गैर जमानती वारंट जारी होना चाहिए।

नागरिकों की सहभागिता से ये होगा
- आइएमए हाल में ब्लड बैंक और महिलाओं के लिए विशेष नि:शुल्क पाक्षिक क्लीनिक
- चिकित्सा बीमा को लेकर जागरूकता बढ़ाने पर होगा जोर
- सेवा भारती की ओर से औषधि बैंक की स्थापना का प्रस्ताव

सीएसआर फंड से ये ढूंढेंगे समाधान
- मजदूरों और कर्मचारियों के लिए मासिक जागरूकता क्लीनिक, जिसमें ब्लड शुगर, बीपी और हीमोग्लोबिन की जांच होगी
- शहरी क्षेत्रों में बीपीएल कार्ड बनाने की व्यवस्था का जिम्मा
- पांच रुपए में देहात क्षेत्र में चश्मा वितरण होगा, जिसका संयोजन कल्याणं करोति करेगी

प्रशासन के सामने ये रखेंगे मांग
- ईएसआई की परमीशन के लिए सहारनपुर के बजाय मेरठ में ही व्यवस्था
- मेडिकल प्रैक्टिशनर एक्ट के अंतर्गत चिकित्सकों के अधिकारों की रक्षा पर जोर, नियमों को अमल में लाएं। साथ ही प्रशासन में एडीएम सिटी और पुलिस में एसपी सिटी को चिकित्सकीय समस्या का नोडल अधिकारी बनाया जाए

बोल अनमोल
स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति में मौलिक सुधार की आवश्यकता है। सरकारी चिकित्सकों के सैकड़ों पद रिक्त पड़े हैं। उन पर काफी समय से भर्ती नहीं की जा रही हैं। वहीं, दूसरी ओर स्थिति यह है कि जिन सरकारी चिकित्सकों को मरीज का उपचार करना चाहिए वह दूसरे अभियानों में लगे रहते हैं। वह अधिकांश प्रशासनिक अफसरों की बैठक में ही व्यस्त रहते हैं। ऐसे में उनके पास इतना समय ही नहीं बच पाता है कि अपना डाक्टर का काम ईमानदारी से कर सकें। ऐसे में स्वास्थ्य सेवाओं पर प्रतिकूल असर पड़ना तय है।
- डॉ. राजीव अग्रवाल, वरिष्ठ कार्डियोलोजिस्ट 

चिकित्सा के पेशे को लेकर हम सभी को सकारात्मक रूख रखना चाहिए। मरीज व चिकित्सक एक दूसरे के प्रति विश्वास रखें। चिकित्सक पर यह आरोप लगता है कि वह अधिक कमाई करते हैं लेकिन एक सच्चाई यह भी है कि चिकित्सक को अपना कमाया पैसा खर्च करने का समय ही नहीं मिलता।
- डॉ. संदीप मित्थल, नेत्र रोग विशेषज्ञ

मरीज की डिमांड लगातार बढ़ रही है। वह दिल्ली की तरह मेरठ में भी सुविधाएं चाहता है। उसका खर्च ज्यादा आता है, जब चिकित्सक अथवा अस्पताल द्वारा उसी तरह की सुविधाएं देकर मरीज से उस खर्च के बिल की मांग की जाती है तो वह अदा नहीं करता। जिससे कई बार टकराव भी होता है। चिकित्सक पर अधिक फीस आदि के आरोप लगते हैं लेकिन सरकार सभी दवा के दाम भी तो निर्धारित करे।
- डॉ. वीरोत्तम तोमर, पूर्व अध्यक्ष आइएमए

समय के साथ हर चीज में बदलाव आया है। चिकित्सा का पेशा भी इससे अछूता नहीं है। हमें यह भी जरूर देखना होगा कि नई चीजें क्यूं आयी हैं। समाज के सहयोग से भी अस्पताल आदि का संचालन किया जा सकता है। औषधि बैंक की स्थापना आदि की जा सकती है। जन सहयोग से चलने वाले अस्पताल व औषधि बैंक से गरीब मरीजों को उपचार एवं दवाएं सस्ती दर पर मिलेंगी।
- डॉ. उमंग अरोड़ा, बाल रोग विशेषज्ञ

महंगाई भी लगातार बढ़ रही है। ऐसे में मरीज के उपचार में चिकित्सक का खर्च भी बढ़ रहा है। पहले जो उपचार सौ रुपये में हो जाता था। अब वह एक हजार में भी नहीं हो पाता। मरीज सस्ता एवं सुलभ उपचार चाहता है। वास्तविकता यह है कि सस्ता एवं सुलभ एक साथ नहीं हो सकता है। यह बात मरीज को समझनी होगी। ज्यादा दबाव बढ़ा तो मेरा मानना है कि जल्दी प्राइवेट क्लीनिक बंद हो जाएंगे।
- डॉ. तनुराज सिरोही, वरिष्‍ठ फिजिशियन

हम हेल्थ को री-प्लेसमेंट के रूप में देख रहे हैं। मरीज एवं उसके तीमारदार यह आकलन करते हैं कि वहां उपचार में उतने लगे। यहां पर इतने लगे। मरीज यह मांग करते हैं कि सस्ता दवा देकर मेरा उपचार कर दीजिए। ऐसा करना उचित नहीं है। स्वास्थ्य सेवाओं का पब्लिक सिस्टम मजबूत होना चाहिए। हम ऊपरी स्तर पर फोकस करते हैं लेकिन जमीनी स्तर पर क्या स्थिति है? यह कभी नहीं देखते कि वहां पर दवा अथवा चिकित्सक उपलब्ध भी है।
- डॉ. सुनील जिंदल, वरिष्ठ एंड्रोलॉजिस्ट

जन सहयोग से हर समस्या का समाधान हो सकता है। मेरा मानना है कि चिकित्सक जितनी परेशानी बताते हैं उतनी है नहीं। चिकित्सकों में सेवा की भावना भी होनी चाहिए। यदि वह चाहें तो सभी समस्याएं एवं चुनौतियां थोड़ा प्रयास कर हल हो सकती हैं। क्योंकि हल निकालना भी हमारी ही जिम्मेदारी है।
- डॉ. एसके सूरी, वरिष्ठ सर्जन

ईएसईइ के माध्यम से उपचार में भी अब परेशानी आ रही है। अस्पताल मरीज का उपचार कर देते हैं, लेकिन उपचार के बाद उनका भुगतान ही नहीं होता। अस्पतालों के करोड़ों रुपया सरकार की ओर बकाया पड़े हैं। भुगतान न होने से अस्पताल भी फिर उपचार करने से किनारा करने लगते हैं। मेरा सुझाव है कि अस्पतालों के बकाया को सरकार द्वारा शीघ्र भुगतान कराया जाना चाहिए।
- डॉ. संदीप जैन, वरिष्‍ठ फिजिशियन

करीब 30-40 साल पहले चैरिटेबल के माध्यम से मरीजों का उपचार होता था। समय के साथ इसमें परिवर्तन आया है अब कॉरपोरेट कल्चर है। सरकार का फोकस भी अब उसी पर है। समस्या का इसका हल सरकार को करना होगा। महिलाओं के लिए महिला क्लीनिक की स्थापना की जा सकती है।
- डॉ. सुधी काम्बोज, एंडोक्राइन सर्जन

जन सहयोग से हर कार्य किया जा सकता है। चिकित्सक की अपनी सीमाएं हैं और मरीज की अपनी मजबूरी। ऐसे में दोनों जनसहयोग के माध्यम से समस्या का हल निकाल सकते हैं।
- डॉ. दिव्या बंसल, बाल रोग विशेषज्ञ

हर व्यक्ति यह चाहता है कि उसे सबसे पहले स्वास्थ्य सुरक्षा मिले। यह सरकार की जिम्मेदारी बनती है, लेकिन उसकी ओर से नहीं मिल पाती है। मेडिकल कालेज एवं जिला अस्पताल की स्थिति सही नहीं है। ऐसे में वह प्राइवेट चिकित्सकों की ओर जाता है कि लेकिन वहां बहुत ज्यादा खर्च आता है, जोकि मरीज की क्षमता से बाहर होता है। मेरा मानना है कि ऐसी भावना से कार्य हो कि चिकित्सक व मरीज के बीच विश्वास बने।
- एएन मल्होत्रा, पूर्व चेयरमैन, आइआइए, मेरठ

गरीब मरीजों के उपचार में मदद के लिए आइआइए पूरी तरह तैयार है। हम इसके लिए अपने कर्मचारियों का बीमा भी करा रहे हैं। करीब 50 हजार का अब तक हो चुका है। आगे भी यह प्रयास जारी है। बाकी को भी इसके लिए प्रेरित कर रहे हैं। ताकि उनके उपचार में कभी कोई बाधा न आए।
- तनुज गुप्ता, सचिव, आइआइए मेरठ

मरीज को चिकित्सक से हमेशा आस रहती है। चिकित्सकों को यह विश्वास मरीजों के प्रति बनाए रखना चाहिए। यदि कोई कार्य अकेले नहीं हो सकता तो जनसहयोग से उसे शुरू किया जा सकता है। हमारी संस्था कर सालों से नेत्र रोगियों के लिए कार्य कर रही है। यदि हम लोग मिलजुल कोई कार्य शुरू करें तो निश्चित सफलता मिलेगी।
- रवि बख्शी, कल्याणं करोति

गरीब मरीजों के उपचार के लिए दवा व्यवसायी हर सहयोग को तैयार हैं। जेनरिक सस्ती दवा उपलब्ध करा सकते हैं। इसके लिए हम मेडिकल बैंक भी बना सकते हैं, जिसमें सभी कुछ न कुछ सहयोग कर सकते हैं। मरीजों को लाने ले जाने के लिए एम्बुलेंस की शुरूआत की जा सकती है।
- रजनीश कौशल, दवा व्यवसायी

दवा व्यवसायी हर सहयोग को तैयार हैं। मरीजों को सस्ती दवा उपलब्ध कराना सरकार का दायित्व है। यदि वह एक ही दवा जो विभिन्न कंपनियों द्वारा मूल्य निर्धारित कर दें तो दवा व्यवसायी, चिकित्सक एवं मरीज तीनों के लिए ही लाभप्रद होगा। मरीज कहीं से भी एक ही दाम में दवा खरीद सकेगा।
- मनोज शर्मा, दवा व्यवसायी

By Nandlal Sharma