कूड़े के दबाव से दबते जा रहे शहर को देखकर हर कोई आक्रोशित होता है। कूड़े के ढेर और गंदगी से निजात चाहता है लेकिन सभी नगर निगम के कर्मचारियों का इंतजार करते रहते हैं। मगर खाद व्यवसायी अमित कुमार अग्रवाल लाखों मेरठवासियों से जुदा हैं। कीटों व फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले पौधों को साफ कर देने वाले उत्पाद बेचते-बेचते उनमें कूड़े की सफाई कर देने का जुनून आया।

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अपने व्यवसाय से वक्त निकालकर हर रविवार को गलियों और सड़कों को चमकाने निकल पड़ते हैं अपनी टीम के साथ। जिसका नाम है टीम क्लीन मेरठ। स्वच्छता सर्वेक्षण में शहर को साफ रखने की अपील के लिए नगर निगम ने उन्हें स्वच्छता दूत बनाया था। वह अब तक 96 रविवार को सफाई कर चुके हैं।

नगर निगम की नाकामी पर अस्तित्व में आई टीम क्लीन
43 वर्षीय अमित दिल्ली रोड स्थित नई मंडी के पास ही श्रीराम पैलेस कालोनी में रहते हैं। शहर में सफाई की अलख जगाने के लिए 2016 में तत्कालीन मंडलायुक्त आलोक सिन्हा ने 'मेरा शहर मेरी पहल' संस्था का गठन किया। इसमें श्रमदान से लोगों को स्वच्छता के लिए प्रेरित करने की जिम्मेदारी अमित को मिली। उन्होंने चंद परिचितों के साथ चार सितंबर 2016 रविवार के दिन प्रात: 6.30 पर कोआपरेटिव बैंक के सामने वाले पार्क की सफाई की शुरुआत की।सफाई करते-करते उन्हें लगा कि सिर्फ जागरूकता फैलाने से काम नहीं चलेगा। सड़क पर उतर कर सफाई भी करनी पड़ेगी। इसी काम के लिए टीम क्लीन मेरठ संस्था अस्तित्व में आई।

इस मुहिम के 82 सदस्यों में डॉक्टर और होटल संचालक भी
शहर में सफाई की समस्या गंभीर है जिसके लिए कोसने के बजाय युवाओं ने स्वयं कुछ करने का बीड़ा उठाया। इसी काम के लिए इस संस्था से 82 सदस्य जुड़ चुके हैं, जिनमें होटल संचालक, डॉक्टर, प्रोफेशनल आदि शामिल हैं। इनमें अभिजीत दुबे, राजेंद्र गुप्ता, मनोज कुमार, धीरज कुमार, प्रिंस अग्रवाल, दिव्या सैनी, दिनेश शर्मा, संदीप गुलाटी, पूनम, कुणाल, नीरज कांत मिश्रा आदि शामिल हैं।

पहले दिन जागरूक करना, दूसरे दिन सफाई करना
उनके अभियान के सकारात्मक असर पड़ने की वजह है कि इसमें स्थानीय लोगों को भी जोड़ा जाता है। जिस जगह पर रविवार को श्रमदान करते हैं उसी जगह पर शनिवार सायं पहले ही जागरूकता के लिए टीम के सदस्य पहुंच जाते हैं। लोगों से इस अभियान में आने का अनुरोध भी करते हैं। टीम ने छात्र-छात्राओं को इससे जोड़ने के लिए एनसीसी, एनएसएस एवं स्कूलों में बच्चों के लिए स्वच्छता कार्यशालाओं का आयोजन भी किया। 

शहर में गंदगी के खिलाफ अलख जगा रहे अमित अग्रवाल ने कहा कि शहर कूड़े से अटा रहता है। मैं अपनी टीम की बदौलत इसे आंदोलन बनाना चाहता हूं ताकि सभी लोग सफाई के प्रति जागरूक हों। इस टीम की वजह से ही सब कुछ मुमकिन हो रहा है। जब तक यह अपना व्यापक असर समाज में न दिखाने लगे इसे बंद नहीं करेंगे। प्रत्येक रविवार प्रात: जारी रखेंगे।

अमित के प्रयास की सराहना करते हुए कीमती लाल जैन ने कहा कि बुढ़ाना गेट पर लंबे समय से कूड़ा पड़ा था जिसे टीम क्लीन ने अभियान चलाकर उसे हटाया और सफाई की। मैंने टीम के सदस्यों को नाली से गीला कीचड़ साफ करते देखा है। काफी नौजवान इस सफाई अभियान से जुड़े हैं। उनके काम पर कुछ लोग हंस रहे थे। मजाक उड़ा रहे थे। मगर उनसे प्रभावित होकर मैंने भी हाथ बंटाया।

यह काम हर कोई नहीं कर सकता। इनकी झाडू सड़क नहीं, हमारे दिमाग के कचरे को साफ करती है। अंकुर मूना ने भी टीम क्लीन मेरठ की मुहिम की प्रशंसा करते हुए कहा कि मेरे अपार्टमेंट व अन्य कालोनी के लोग टीम क्लीन के जागरूकता अभियान से प्रभावित हैं। टीम क्लीन मेरठ ने भी यहां भी साप्ताहिक अभियान चलाया था। साकेत ही नहीं इससे पूरा शहर की लाभान्वित हो रहा है। इनके जागरूकता का तरीका कारगर है।

स्मार्ट सिटी के सपने वाले शहर को ऐसा जुनून चाहिए
मेरठ शहर ने स्मार्ट सिटी में शामिल होने के लिए दौड़ लगाई थी लेकिन मूलभूत सुविधाओं के मानदंड पर शहर पिछड़ गया था। साफ-सफाई के लिए जिन संसाधनों व मूलभूत सुविधाओं की जरूरत थी उसकी भी कमी नगर निगम में है। स्वच्छता सर्वेक्षण-2017 में 339 रैंक के साथ मेरठ गंदे शहरों में शामिल था।

स्वच्छता सर्वेक्षण-2018 में भी मेरठ 326वीं रैंक पाकर फिसड्डी शहरों में शामिल हुआ। ऐसे में शहर को इस तरह का काम करने वाले हीरो की जरूरत है जो शहर को स्वच्छ रखने व स्मार्ट बनाने के लिए लोगों को प्रेरित करते हैं और अपना महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।

ताने मारते थे लोग, फोटो खिंचवाने को लगा रहे झाडू
जब शुरू में टीम क्लीन श्रमदान करने जाती थी तो कई बार लोग कहते थे कि यह लो फोटो खिंचवाने आ गए? कोई कहता अरे आज कोई त्योहार है क्या? इससे उन्होंने हार नहीं मानी। इसी तरह की चुनौती का सामना उन्हें क्लाथ बैंक (दान में मिले कपड़े का स्थान) के तहत गरीबों को कपड़े बांटने में करना पड़ा। कई जगह छीना झपटी या धक्का-मुक्की भी हुई। उनका कहना है कि फिर भी इस बात से खुश हैं कि उनके कार्य का सकारात्मक असर दिख रहा है। लोगों को हकीकत में सफाई होती दिखती है। स्थानीय लोग स्वयं भी इसमें प्रतिभाग करते हैं।

संसाधन होते तो बढ़ा लेते प्रसार क्षेत्र
अमित कहते हैं कि इस कार्य में उनका व उनकी टीम का पैसा व वक्त खर्च होता है। इसमें उपयोग में लाए जा रहे संसाधन वे स्वयं एकत्र करते हैं। कुछ कार्य उन्हें हाथों से करना पड़ता है। यदि उनके पास संसाधन होते मशीनें होती तो प्रसार क्षेत्र बढ़ा लेते। कार्य तेजी से होता।

By Krishan Kumar