मन की मुक्ति से खुलता है अमृत का द्वार! 14 वर्ष के मौन में ओशो की पहली संन्यासिनी के बुद्धत्व यात्रा दर्शाती एक किताब
ओशो की प्रथम महिला संन्यासिनी मां आनंद मधु के 14 वर्ष के मौन से बुद्धत्व तक की आध्यात्मिक यात्रा पर ...और पढ़ें

ओशो की प्रथम महिला संन्यासिनी मां आनंद मधु का जीवन पर पुस्तक के विमोचन अवसर पर ध्यानमग्न ओशो सन्यासी। जागरण
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ओशो की प्रथम संन्यासिनी मां आनंद मधु की पुस्तक का विमोचन।
ओशो के 14 वर्ष के मौन से बुद्धत्व तक की यात्रा दर्शाती किताब।
जागरण संवाददाता, मेरठ। मानसिक तनाव, आघात और जीवन की आपाधापी से मुक्ति का मार्ग बाहर नहीं, बल्कि मन की मुक्ति से होकर गुजरता है। ओशो की प्रथम महिला संन्यासिनी मां आनंद मधु का जीवन इसी आंतरिक यात्रा और आत्मबोध का उदाहरण रहा। उनका प्रमुख संदेश था-'मन की मुक्ति से खुलता है अमृत का द्वार।' इसी संदेश और उनके 14 वर्ष के मौन से बुद्धत्व तक की आध्यात्मिक यात्रा को पुस्तक के रूप में संजोया गया है।

रविवार को छावनी स्थित मधु वाटिका के ओशो आश्रम में करीब 40 ओशो सन्यासियों की उपस्थिति में मां आनंद मधु के जीवन पर आधारित पुस्तक '14 वर्ष मौन से बुद्धत्व की यात्रा' का विमोचन किया गया। देहरादून से आए स्वामी सतीश ने पुस्तक की विषयवस्तु और मां आनंद मधु की साधना यात्रा पर प्रकाश डाला। पुस्तक का विमोचन स्वामी शंशांक ने किया।
पुस्तक के लेखक स्वामी शांतम पर्वत और सह लेखिका एवं संपादिका वीना अरोड़ा ने मां आनंद मधु के साथ बिताए अनुभवों और स्मृतियों को शब्दों में पिरोया है। पुस्तक में उनकी साधना, मौन, ओशो के सानिध्य और उनके संदेशों को वर्तमान समय की मानसिक चुनौतियों से जोड़ते हुए प्रस्तुत किया गया है। वक्ताओं ने कहा कि आज जब व्यक्ति विभिन्न प्रकार के मानसिक आघात और तनाव से गुजर रहा है, ऐसे में मां आनंद मधु की जीवन यात्रा भीतर की शांति और स्वयं से साक्षात्कार का मार्ग दिखाती है।
स्वामी शान्तं पर्वत ने बताया कि मां आनंद मधु ने अपने जीवन में 14 वर्ष का मौन साधा, जिसमें तीन वर्ष की कठिन साधना 'कास्ट मौन' भी शामिल थी। इस अवधि में साधक को एक कमरे में रहकर बोलने, पढ़ने और बाहरी दुनिया से संपर्क रखने से भी दूर रहना पड़ता है। उनके मौन के दौरान देश के प्रमुख टेलीविजन चैनलों ने साक्षात्कार लेने की इच्छा जताई, लेकिन उन्होंने इसे स्वीकार नहीं किया।
उनका मानना था कि उनके जीवन के बारे में उनके शरीर में रहते हुए नहीं, बल्कि उनके जाने के बाद लिखा जाए। आज उनके देहावसान के बाद उनकी साधना यात्रा को पुस्तक के माध्यम से उनके जन्मदिन के अवसर पर लोगों तक पहुंचाया गया है।
सह लेखिका बीना अरोड़ा ने बताया कि ओशो ने मां आनंद मधु को आत्म-अन्वेषण की दिशा में आगे बढ़ाते हुए 11 दिनों तक लगातार 'मैं कौन हूं?' प्रश्न पर ध्यान करने की साधना कराई थी। बाद में उन्हें कीर्तन मंडली के साथ देशभर में यात्रा करने का अवसर मिला। ओशो ने उन्हें निर्देश दिया था कि जिस शहर में कोई व्यक्ति संन्यास न ले, वहां माला जमीन में दबा दें। मेरठ में भी ऐसा ही हुआ और उन्होंने कंपनी बाग स्थित फव्वारे के सामने माला जमीन में दबाई थी। साधकों ने इसे आध्यात्मिक यात्रा का एक महत्वपूर्ण प्रसंग बताया।
उन्होंने मां आनंद मधु के निर्भीक जीवन को ओशो की सीख 'सबसे बड़ा रोग क्या कहेंगे लोग' से जोड़ा। उनके अनुसार मां आनंद मधु ने लोगों की परवाह किए बिना अपने भीतर की यात्रा को प्राथमिकता दी। उनके सानिध्य में आने वाले साधकों का जीवन भी बदला और वे जड़ता से निकलकर चेतना की प्रवाहमान अवस्था की ओर बढ़े।
स्वामी आनंद आलोक 'मधु' ने बताया कि उन्होंने 1987 में संन्यास लिया था और मां आनंद मधु के साथ लंबे समय तक जुड़े रहे। 2021 में उनके देहावसान तक वे उनसे नियमित रूप से मिलते रहे। बाद में उन्होंने अपने स्थान को ओशो ध्यान केंद्र के रूप में विकसित कर उसका नाम मधु वाटिका रखा।
'मधु' नाम मां आनंद मधु और स्वामी आनंद आलोक, दोनों से जुड़ा होने के कारण इसे उनके प्रति श्रद्धांजलि के रूप में चुना गया। आज मधु वाटिका मां आनंद मधु के स्मृति स्थल के रूप में साधकों के लिए ध्यान और आध्यात्मिक साधना का केंद्र बनी हुई है। कार्यक्रम में स्वामी ध्यान गंतु, स्वामी प्रेम मस्तो, मां ध्यान यात्री, मां सारिका समेत अनेक ओशो संन्यासियों ने सहभागिता की और पुस्तक प्रकाशन में सहयोग दिया।
साधकों ने कहा कि मां आनंद मधु आज भौतिक रूप से उनके बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी साधना, मौन और संदेश आज भी उनके जीवन में प्रेरणा का स्रोत बने हुए हैं। रविवार को मधु वाटिका में होने वाले ध्यान, सामूहिक उत्सव और सहभोज के माध्यम से भी उनके आध्यात्मिक जीवन की स्मृतियों को जीवंत रखा जा रहा है।
मां आनंद मधु का जीवन इस विचार को रेखांकित करता है कि बाहरी परिस्थितियों को बदलने से पहले मन की अशांति से मुक्त होना जरूरी है। इसी आंतरिक मुक्ति को उनकी साधना और पुस्तक का केंद्रीय संदेश बताया गया है।
