जागरण संवाददाता, सहारनपुर। सहारनपुर के ऐतिहासिक छड़ी पूजन मेले पर रोक जिला प्रशासन ने इस साल भी रोक लगा दी है। पिछले दो सालों से कोरोनो के कारण यह मेला नहीं लग पा रहा है, यह मेला पश्चिम उप्र के सबसे बड़े मेलों में से एक है, इसमें प्रति वर्ष लाखों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं, और अपनी मनोकामना के लिए प्रार्थना करते हैं। आखिर म्हाड़ी को लेकर यह अटूट आस्था क्यों है, यह जानना आवश्यक है।

सहारनपुर में गंगोह रोड मानकमऊ पर सैकड़ों वर्षों से जाहरवीर गोगा म्हाड़ी पर यह मेला लगता है। प्रति वर्ष जाहरवीर गोगाजी महाराज की स्मृति में लगने वाला मेला गुघाल पश्चिम उप्र के हिंदू मुस्लिम एकता व सांप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक भी माना जाता है। गोगा महाराज की म्हाड़ी पर प्रति वर्ष लाखों लोगो शीश नवाकर अपनी मनोकामना मांगते हैं। गुग्घा पीर तथा गुग्घा वीर के नाम से भी यह म्हाड़ी प्रख्यात है। म्हाड़ी को लेकर अटूट आस्था कई राज्यों के लोगों में है।

जाहरवीर गोगा कौन हैं

जाहरवीर गोगा का जन्म राजस्थान के चुरू के ददरेहड़ा ग्राम में हुआ था। इनके पिता का नाम राजा जेवर सिंह तथा माता का नाम बाछल था। इन्हें जाहर वीर गोगा चौहान कहा जाता है। गोरख गद्दी व म्हाड़ी आज भी बीकानेर के बागड़ में है। सहारनपुर में सदियों पूर्व गंगोह रोड पर जाहरवीर गोगा जी महाराज की म्हाड़ी स्थापित हुई। तभी से यहां मेला गुघाल लग रहा है। हर साल लाखों श्रद्धालु यहां मन्नतें मांगने आते हैं। यहां पर निशान चढ़ाने की परंपरा भी है।

सहारनपुर आए थे गोगा जी चौहान

मेले के अवसर पर नेजा छड़ी का भी इतिहास है। यह कहा जाता है 1450 साल पहले जाहरवीर गोगा जी चौहान सहारनपुर आए थे तथा नेजा वहां स्थापित किया था जहां आज म्हाड़ी है । तभी से मेले से पूर्व छड़ियों के पूजन की परंपरा है तथा नेजा छड़ी सभी छड़ियों की प्रधान है।

अंग्रेज अफसर को मिला था सबक

मेले से पूर्व करीब 15 दिनों तक नगर में छड़ियों को घुमाया जाता है। घर घर छड़ी पूजन तथा बसेरा व भंडारा किया जाता है। मेला गुघाल के बारे में यह कहा जाता है कि एक अंग्रेज कलक्टर ने मेला नहीं लगने दिया था तो हजारों सांपों ने कलक्टर आवास को घेर लिया था। 

Edited By: Himanshu Dwivedi

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