मेरठ, [विवेक राव]। प्रोटीन से भरपूर हमारी चपाती (रोटी) भी कमजोर हो रही है। यह कमजोर रोटी खाने वालों को भी कमजोर करने लगी है। दरअसल,जिस गेहूं की रोटी हम खा रहे हैं,उसमें जिंक व आयरन जैसे तत्व नहीं हैं। उत्तर भारत में पैदावार बढ़ाने की होड़ में गेहूं की जिन प्रजातियों को बोया जा रहा है, उनमें ऐसे पोषक तत्वों की कमी है। चौ. चरण सिंह विश्वविद्यालय (सीसीएसयू) के जेनेटिक एंड प्लांट ब्रीडिंग में अब गेहूं की ऐसी नई प्रजाति पर शोध हो रहा है,जो जिंक व आयरन जैसे पोषक तत्वों से भरपूर रहेगी।
पोषक नहीं रह गई रोटी
सीसीएसयू में जेनेटिक एंड प्लांट ब्रीडिंग विभाग में एमरेटस प्रोफेसर पीके गुप्ता ने उत्तर भारत में बोई जाने वाली गेहूं की अधिकतर प्रजातियों में जिंक और आयरन की कमी पाई है। जिंक व आयरन न होने की वजह से ऐसे गेहूं से बनी रोटी पोषक नहीं रह गईं है। कृषि वैज्ञानिक गेहूं की ऐसी प्रजातियों पर काम करते रहे हैं, जिससे पैदावार बढ़ सके।
गेहूं की प्रजाति पर हो रहा काम
प्रो. गुप्ता गेहूं की ऐसी नई प्रजाति पर काम कर रहे हैं,जिसमें जिंक व आयरन की मात्र पर्याप्त हो। साथ ही पैदावार भी अन्य प्रजातियों से बेहतर रहे। इसके लिए राष्ट्रीय कृषि खाद्य जैव प्रौद्योगिकी संस्थान (नाबी) मोहाली के साथ उन्हें प्रोजेक्ट मिला है। तीन साल में लैब से विकसित होकर गेहूं की नई प्रजाति खेतों तक पहुंचाने का लक्ष्य है।
गेहूं पर अब तक कई रिसर्च
प्रो. गुप्ता विश्वविद्यालय में रहते हुए अमेरिका के सहयोग से गेहूं की दो-तीन प्रजातियां विकसित कर चुके हैं। इसमें अधिक तापमान पर प्रचुर उपज वाली प्रजाति से लेकर बीमारियों से मुक्त प्रजाति प्रमुख हैं। हालांकि इसमें से कुछ प्रजाति रोग लगने से विकसित न हो पाईं।
क्यों जरूरी है जिंक व आयरन
फिजीशियन डॉ.तनुराज सिरोही की माने तो हमारे भोजन में जिंक व आयरन जरूरी है। आयरन की कमी होने से एनीमिया की समस्या होती है,जिससे थकावट आती है। चेहरे की रंगत फिकी पड़ने लगती है। वहीं जिंक की कमी होने से रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होती है,जख्म होने पर जल्दी नहीं भरते हैं। जिंक का इस्तेमाल ओआरएस घोल में भी हो रहा है,जो बच्चों के दस्त में उपयोगी है। बाजार में आयरनयुक्त फोर्टिफाइड आटा भी आ रहा है,जो महिलाओं के लिए लाभकारी है।
कमी यहां से पूरी करें
डाइटीशियन डॉ. भावना गांधी का कहना है कि जिंक व आयरन की कमी पूरी करने के लिए केला, गुड़, लहसुन, तिल, मुनक्का,काजू,पालक,अनार,अंडे की जर्दी आदि का इस्तेमाल किया जा सकता है।
इनका कहना है
अभी तक गेहूं पर जो भी रिसर्च हुए हैं, उसका लाभ किसानों को नहीं मिल पाया है। किसानों के पास ऐसी कोई तकनीक नहीं है, जिससे वह पता लगा सकें कि जिस गेहूं को वह उगा रहे हैं,उसकी गुणवत्ता कैसी है। इसलिए वह लैब में विकसित होने वाली नई प्रजाति को लैंड यानी खेतों तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे। उनका यह शोध इसी दिशा में होगा।
- प्रो.पीके गुप्ता,प्रोफेसर,जेनेटिक एंड प्लांट ब्रीडिंग विभाग,सीसीएसयू 

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Posted By: Ashu Singh

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