मेरठ, जेएनएन। डौरली गांव निवासी स्वतंत्रता सेनानी वेदपाल शास्त्री का बीमारी के कारण गुरुवार को निधन हो गया। वह सौ वर्ष के थे। उनके निधन की सूचना पर गांव, क्षेत्र में शोक छा गया। गांव में ही राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया।

वेदपाल शास्त्री का जन्म डौरली गांव में किसान परिवार में हुआ था। उनकी पत्नी कमलावती थीं। उनके तीन पुत्र और तीन पुत्री में से एक पुत्र दिनेश कुमार और पुत्री कविता का निधन हो चुका है। दो पुत्री मंजू व मुमनबती शादीशुदा हैं। दो पुत्र देवराज व सुशील कुमार चिकित्सक हैं।

पुत्र डा. देवराज ने बताया कि चार दिन पूर्व पिता की तबियत बिगड़ी थी। शुगर की भी दिक्कत थी। उन्हें एसडीएस ग्लोबल अस्पताल में भर्ती कराया। बाद में पल्लवपुरम फेज-दो स्थित नर्सिंग होम में भर्ती कराया, जहां गुरुवार को उन्होंने आखिरी सांस ली। इस दौरान उनके दोनों पुत्र साथ थे।

स्वजन उनका पार्थिव शरीर डौरली गांव में लेकर पहुंचे। एडीएम-एफ, एसडीएम सरधना, इंस्पेक्टर दौराला पुलिस के साथ गांव पहुंचे। गांव के श्मशान घाट पर उनके पार्थिव शरीर को तिरंगे में लपेटा गया। इसके बाद अंतिम संस्कार हुआ। मुखाग्नि बड़े बेटे डा. देवराज ने दी। पुलिस ने गार्ड आफ आनर दिया। भाजपा नेता समीर चौहान, शीलेंद्र चौहान, दीपक चौहान, गीतकार मनोज कुमार मनोज आदि ने शोक व्यक्त किया।

कोतवाली में बोले थे भारत माता के जयकारे

डा. देवराज शास्त्री बताते हैं कि 12 अगस्त 1942 को घंटाघर पर उनके पिता को पुलिस ने उनके साथी मूलशंकर व रघुवीर के साथ गिरफ्तार किया था। तीनों को कोतवाली ले गए। कोतवाल ने कहा कि लिखित में दो कि अब दोबारा भारत माता और गांधी जी के जयकारे नहीं लगाओगे। तीनों सेनानियों ने कोतवाल के सामने ही भारत माता और गांधी जी की जय बोल दी। तीनों को जेल भेज दिया था। जज ने छह माह की सजा सुनाई। मेरठ जेल से इन्हें आगरा जेल भेजा गया, जहां से कोर्ट ने रिहा किया था।

गुरुकुल डौरली में छात्र से प्रधानाचार्य तक का सफर

वेदपाल शास्त्री ने गुरुकुल, डौरली से पढ़ाई की। आगे की पढ़ाई के बाद वह 1943 में गुरुकुल डौरली में ही शिक्षक बने थे। 1952 तक संस्कृत अध्यापक के रूप में कार्य किया। गुरुकुल के इंटर कालेज में परिवर्तित होने के बाद वहीं पर हिंदी प्रवक्ता बने। 1972 में इसी कालेज में प्रधानाध्यापक बने। बच्चों को संस्कारवान बनाने पर उनका हमेशा जोर रहा। 1985 में सेवानिवृत्त हो गए थे। उन्हें प्रदेश और केंद्र सरकार से स्वतंत्रता सेनानी की पेंशन के अलावा प्रधानाचार्य की भी पेंशन मिलती थी। 

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