मेरठ, [दिलीप पटेल]। सरकारी प्रतिबंधों का उल्लंघन किस तरह किया जाता है, अगर यह जानना हो तो कम्युनिटी किचन एक बार घूम आइए। कल तक जिस पॉलीथिन के उपयोग पर नगर निगम का प्रवर्तन दल अच्छा-खासा जुर्माना ठोंक देता था, आज उसी पॉलीथिन में जरूरतमंदों के भोजन के पैकेट वितरण के लिए जा रहे हैं। खुलेआम खतरनाक पॉलीथिन का उपयोग हो रहा है। खतरनाक इसलिए है कि कोरोना वायरस पॉलीथिन में 72 घंटे जीवित रहता है। इस बात से अफसर वाकिफ हैं, फिर भी आंख बंद किए हैं। ये बात दीगर है कि आए दिन रसोई में जाकर यही अफसर साफ-सफाई बेहतर रखने के उपदेश देते हैं। कोरोना वायरस के संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए अफसर कितने गंभीर हैं, खतरनाक पॅालीथिन में भोजन वितरण से इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है। जनता गलती करे तो समझ आता है लेकिन अब सिस्टम को कौन समझाए।

रोग फैलाते संस्थानों के कबाड़

बरसात का मौसम आ रहा है। नगर निगम और मलेरिया विभाग ने कहना शुरू कर दिया है कि लोग घरों की छतों पर कबाड़ न रखें, इनमें पानी एकत्र होता है। इसमें डेंगू का मच्छर पनपता है। बात सही है, लोगों का माननी चाहिए लेकिन इन विभागों को खुद के परिसर में जमा कबाड़ नजर नहीं आ रहा है। न ही दूसरे सरकारी विभागों में रखा कबाड़ दिखाई दे रहा है। सरकारी परिसरों मेंं जमा ये कबाड़ रोग फैलाने के लिए काफी है। इनमें तमाम प्रकार के बैक्टीरिया जन्म ले सकते हैं। कोरोना महामारी के दौर में सरकारी परिसरों में डंप कबाड़ को सैनिटाइज भी नहीं किया गया है। अगर डेंगू या अन्य बैक्टीरिया के प्रकोप से बचना है तो घरों के साथ-साथ सरकारी परिसरों में डंप कबाड़ की नीलामी कर उसे समाप्त करना होगा वरना, बीते वर्षों में डेंगू कोहराम मचा ही चुका है।

सैनिटाइजेशन की राह देखतीं कालोनियां

याद करिए, जब पहला लॉकडाउन था। नगर निगम ने टैंकरों में क्लोरीन युक्त पानी भर कर सार्वजनिक स्थानों पर खड़े कर दिए थे ताकि लोग हाथ धुलाई कर सकें और संक्रमण की रोकथाम हो सके। ठीक इसी तरह सड़कों पर टैंकरों से केमिकल घोल का छिड़काव सुबह-शाम होने लगा था। निगम की यह गतिविधि तब थी जब शहर में कोरोना संक्रमितों की संख्या गिनती में थी लेकिन चौथे लॉकडाउन तक पहुंचते-पहुंचते सैनिटाइजेशन में भी खानापूर्ति होने लगी। अब न सड़क पर टैंकर छिड़काव करते नजर आ रहे हैं और न ही मोहल्लों में सैनिटाइजेशन करने पहुंच रहे हैं। जबकि कोरोना संक्रमितों की संख्या 400 के पार पहुंच गई है। जब मुश्किल दौर है तब बचाव नदारद है। कालोनियों से लोग सैनिटाइजेशन की गुहार लगा रहे हैं। मांग पूरी करने में असमर्थ अफसर अब यही कह रहे हैं कि ज्यादा सैनिटाइजेशन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।

नालों के किनारे हो पौधरोपण

मानसून की दस्तक के साथ पौधरोपण शुरू हो जाएगा। सरकारी विभागों को लक्ष्य मिलने लगे हैं। इस बार नगर निगम को एक लाख पौधरोपण का लक्ष्य मिला है। नगर निगम शहर के बाहर परतापुर में ऑक्सीजन पार्क विकसित करने का प्लान बना रहा है। यह ठीक भी है, लेकिन पर्यावरण तो शहर के अंदरूनी हिस्से में अधिक दूषित है। शहर में पार्क तो हैं ही, कई बड़े नाले भी हैं जिनके किनारे पौधरोपण के लिए पर्याप्त जगह है। अगर नालों के किनारे पौधरोपण किया जाए तो यहां उत्पन्न हानिकारक गैसों को पेड़ अवशोषित करेंगे। इससे शहर के पर्यावरण को दूषित होने से काफी हद तक बचाया जा सकता है। दूसरे स्थान अस्थाई कचरा स्थल हैं जहां पौधरोपण कर उन स्थानों को कचरा मुक्त किया जा सकता है। अगर नगर निगम इस पर अमल करे तो हजारों पेड़ शहर में तैयार हो सकते हैं।

Posted By: Taruna Tayal

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