मेरठ, जेएनएन। लॉकडाउन ने प्रवासी कामगारों का रोजगार छीन लिया और अब भविष्य की चिता सता रही रही है। दो माह से अधिक हो गए जमापूंजी एकत्र की वह खत्म हो गई अब लोगों से उधारी लेकर परिवार की जीविका चला रहे हैं। अब वापस काम पर लौटे या यहीं रोजगार की तलाश करें यह सब सोचकर आत्ममंथन में दिन गुजर रहे। पराए शहर में उठाई भारी परेशानियां अब वहां वापस लौटने से कदम रोक रहीं हैं।

मवाना के मोहल्ला मुन्नालाल निवासी मोहम्मद समीम सलमानी के चार बच्चे हैं। जीविका पार्जन के लिये वह दिल्ली में नाई की दुकान चलाता था। उसका एक लड़का तारिक शिमला में मोबाइल कंपनी में काम करता है। दूसरा लड़का नदीम कश्मीर में नौकरी करता है। लॉकडाउन के कारण दुकान बंद होने से समीम दो पहले घर पर लौट आया था। बेटा तारिक ईद से दो दिन पहले आ गया था। घर तक पहुंचने में उठाई परेशानियों को यादकर शरीर में सिरहन सी दौड़ पड़ती है। कई दिनों तक बंद कमरों में कैद रहे तब बाहर निकले तो पैदल ही यहां तक पहुंचना पड़ा। यह भूखे-प्यासे सहनी पड़ी। आखिर जो जमा-पूंजी पास थी वह परिवार को जिदा रखने के लिए लगा दी। किसी तरह घर वापसी हो पाई। अब वापस लौटे या यहीं रहे यह दुविधा है। समीम बताते कि लॉकडाउन की वजह रोजगार ठप हो गया है। रिश्तेदारों से मदद लेकर दो वक्त की रोटी का बंदोबस्त किया। ईद पर्व भी फीका रहा है। बड़ा बेटा नदीम लॉकडाउन की वजह से कश्मीर में फंसा है। सरकार से भी कोई मदद नहीं मिल पायी है। सरकारी राशन भी नहीं मिल पा रहा है।

..इनके सामने भी छाया आíथक संकट

क्षेत्र के गांव पहाड़पुर के योगेंद्र व देशराज नोएडा में एक फैक्ट्री में नौकरी करते थे, लेकिन लॉकडाउन की वजह से फैक्ट्री बंद हो गई। जिसके कारण वे किसी तरह गांव लौट आये। गांव में कोई रोजगार नहीं मिल पा रहा है। जिससे परिवार के सामने आíथक संकट है। दिल्ली से लौटे विकास, विक्की व अंकित की हालत भी इनसे जुदा है। इनका कहना है कि प्रवासी मजदूरों के लिये खाली घोषणाएं हो रही हैं, लेकिन धरातल पर कुछ नहीं है।

-आसपास कस्बों में प्रवासी मजदूरों की यहीं चिता

औद्योगिक ईकाइयां धीरे-धीरे चल रही लेकिन मैनपॉवर मौजूद नहीं होने के कारण अभी पहिया चलना मुश्किल दिखाई दे रहा है। हस्तिनापुर, बहसूमा, फलावदा, परीक्षितगढ़ समेत अन्य स्थानों पर प्रवासी मजदूर हैं लेकिन सभी के सामने यहीं समस्या है।

Posted By: Jagran

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