कौन थे धर्मपाल, जिन्होंने ब्रिटिश दस्तावेजों से ही साबित किया कि अंग्रेजों से पहले बहुत बेहतर थी हमारी शिक्षा प्रणाली
मेरठ काॅलेज से पढ़ाई छोड़कर आजादी की लड़ाई में शामिल होने वाले इतिहासकार धर्मपाल ने ब्रिटेन में हजारों मूल दस्तावेजों ...और पढ़ें

स्वतंत्रता सेनानी व इतिहासकार धर्मपाल और उनकी पुस्तक का मुख्य पृष्ठ। सौ. dharampal.net
HighLights
स्वतंत्रता सेनानी और इतिहासकार धर्मपाल की पुण्यतिथि पर विशेष।
'द ब्यूटीफुल ट्री' पुस्तक से साबित की स्वदेशी शिक्षा प्रणाली की श्रेष्ठता।
प्रवीण वशिष्ठ, मेरठ। मात्र 18 साल की उम्र में मेरठ काॅलेज से पढ़ाई छोड़कर आजादी की लड़ाई में शामिल होने वाले धर्मपाल के नाम से आज की पीढ़ी परिचित नहीं है। वह स्वतंत्रता सेनानी के साथ-साथ गांधीवादी विचारक, इतिहासकार, समाजसेवी और ग्रामीण विकास को समर्पित हस्ती थे।
उन्होंने ब्रिटेन में करीब दो दशक तक शोध कर अंग्रेजों की इस औपनिवेशिक सोच को गलत साबित किया, जिसमें कहा जाता था कि भारत की स्वदेशी शिक्षा बहुत पिछड़ी हुई थी और अंग्रेजों के आने के बाद इसमें बड़े सुधार हुए।
कांधला कस्बे में हुआ था जन्म
धर्मपाल का जन्म 19 फरवरी 1922 को तत्कालीन मुजफ्फरनगर और वर्तमान शामली जिले के कांधला कस्बे में केशो राम गुप्ता और मायावती देवी के घर हुआ था। भारतीय रिजर्व बैंक में कार्यरत पिता का तबादला लाहौर होने पर उनकी इंटर तक की शिक्षा वहीं हुई।
इसके बाद उन्हाेंने गवर्नमेंट कालेज लाहौर में बीएससी (फिजिक्स) में प्रवेश लिया। हालांकि यहां से वह 1940 में मेरठ काॅलेज आ गए। इसके बाद उनका विचार रुड़की इंजीनियरिंग कॉलेज से पढ़ाई करने का था, लेकिन महात्मा गांधी के आह्वान पर अक्टूबर 1940 में पढ़ाई छोड़ दी और आजादी की लड़ाई में शामिल हो गए।
भारत छोड़ो आंदोलन में की सक्रिय भागीदारी
1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भागीदारी की। इसमें दिल्ली, मेरठ, इलाहाबाद और पटना आदि शहरों में स्वत्रंतता सेनानियों के संदेशों को पहुंचाने और स्वत्रंतता से जुड़े साहित्य का वितरण करना भी शामिल था।
इस दौरान सुचेता कृपलानी, गिरधर कृपलानी और स्वामी आनंद का उन्हें सानिध्य मिला। अप्रैल-जून 1943 में स्वतंत्रा सेनानी सादिक अली के साथ दिल्ली के एक थाने में हिरासत में रखा गया।
किसान आश्रम में मिला मीरा बेन का मार्गदर्शन

1946 में मीरा बेन के साथ धर्मपाल (मध्य में)। सौ. dharampal.net
धर्मपाल ने वर्ष 1944 से 1947 तक रूड़की-हरिद्वार के पास स्थित किसान आश्रम में गांधीजी की शिष्या मीरा बेन के मार्गदर्शन में ग्रामीण विकास के लिए कार्य किया। आजादी के बाद कमला देवी चट्टोपाध्याय, डॉ. राम मनोहर लोहिया व एलसी जैन के साथ शरणार्थियों के पुनर्वास में जुटे रहे। इनके साथ मिलकर 1948 में 'इंडियन कोऑपरेटिव यूनियन' की स्थापना की।
लगभग दो दशक तक किया ब्रिटेन में शोध

प्रो. गीता धर्मपाल।
धर्मपाल की पुत्री प्रो. गीता धर्मपाल ने फोन पर 'जागरण' को बताया कि उनके पिता ने वर्ष 1966 से लगभग दो दशक तक ब्रिटेन के अभिलेखागारों (विशेषकर ब्रिटिश म्यूजियम और इंडिया ऑफिस लाइब्रेरी लंदन) में भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी और ब्रिटिश शासन से जुड़े हजारों मूल दस्तावेजों का अध्ययन किया। इनके आधार पर भारतीय शिक्षा, विज्ञान, तकनीक, पंचायतों और समाज पर पुस्तकें लिखीं।
इनमें 'द ब्यूटीफुल ट्री: इंडिजिनस इंडियन एजुकेशन इन द एटीनथ सेंचुरी' (The Beautiful Tree: Indigenous Indian Education in the Eighteenth Century) प्रसिद्ध रचना मानी जाती है।
इस पुस्तक में मद्रास, बंगाल और पंजाब के ब्रिटिश भारत के राज्यों से जुड़े दस्तावेजों का हवाला दिया। इसमें उन्होंने इस दावे को तार-तार कर दिया जिसमें कहा जाता था कि अंग्रेजों के आने से पहले भारत शिक्षा के क्षेत्र में बहुत पिछड़ा हुआ था।
श्रेष्ठ थी भारतीय शिक्षा प्रणाली, सभी जातियों के थे शिक्षक-छात्र
धर्मपाल ने अपनी पुस्तक में भारत में तैनात रहे प्रमुख ब्रिटिश अधिकारियों आदि के पत्रों व दस्तावेजों के हवाले से बताया कि ईस्ट इंडिया कंपनी के आने के दौरान व उससे पहले भारतीय गांवों में अंग्रेजी दौर से कहीं विकसित शिक्षा प्रणालियां थीं। कोर्स में पढ़ना, लिखना, गणित, साहित्य, कानून और विज्ञान आदि विषय शामिल थे।
शिक्षा देने और प्राप्त करने पर किसी जाति विशेष का अधिकार नहीं था। शिक्षकों और छात्रों में सभी जातियों के लोग थे। उन्होंने दस्तावेजी सबूतों के आधार पर छात्रों के जाति-वार आंकड़े भी प्रकाशित किए। बताया कि अंग्रेजों के आने से पहले आमतौर से इन राज्यों में औसतन 1000 की आबादी पर एक स्कूल था।
ये थे प्रमुख दस्तावेजी प्रमाण
धर्मपाल ने अंग्रेजों के आगमन से पहले भारत की शिक्षा व्यवस्था को लेकर शोध में मद्रास और बंगाल की ब्रिटिश भारतीय प्रेसीडेंसियों और पंजाब से जुड़े दस्तावेजों का हवाला दिया।
इनमें 1822–1825 के दौरान मद्रास के गवर्नर सर थॉमस मुनरो द्वारा करवाया गया सर्वेक्षण, ईसाई मिशनरी विलियम एडम (1835–1838) द्वारा बंगाल पर तैयार की गई रिपोर्टें और पंजाब पर जीडब्ल्यू लीटनर की रिपोर्टें (1849–1882) सहित हजारों दस्तावेज शामिल थे।
शोध में खोजते थे प्रश्नों का हल: प्रो. गीता धर्मपाल

वर्ष 1993 में बेटी प्रोफेसर गीता के साथ स्वतंत्रता सेनानी धर्मपाल। सौ. धर्मपाल डाॅट नेट
धर्मपाल की बेटी प्रोफेसर गीता धर्मपाल जर्मनी के हीडलबर्ग विश्वविद्यालय के दक्षिण एशिया संस्थान (South Asia Institute) के इतिहास विभाग से सेवानिवृत्त हुई हैं। उन्होंने बताया कि वह प्रश्नों का हल शोध में खोजते थे। एक समय फिजिक्स का विद्यार्थी रहने पर भी उनकी इतिहास में अत्यधिक रुचि थी। पिता के कारण उनकी रुचि भी इतिहास में हुई।
महात्मा गांधी के संबोधन से मिली पुस्तक लिखने की प्रेरणा
गीता धर्मपाल ने बताया कि 'द ब्यूटीफुल ट्री...' की रचना की प्रेरणा उनके पिता को महात्मा गांधी के 1931 में लंदन के संबोधन मिली थी, इसमें गांधीजी ने कहा था कि पिछले 50 से 100 वर्षों में भारत में शिक्षा का स्तर गिरा है। भारतीय शिक्षा के इस 'सुंदर वृक्ष' (beautiful tree) के पतन के लिए ब्रिटिश शासन जिम्मेदार है।
आजादी के बाद धर्मपाल ने संभाली कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां
- 1948: इजरायल में कृषि पुनर्निर्माण कार्यक्रम के तहत कार्य किया। बाद में लंदन स्कूल ऑफ इकोनामिक्स में अंतरराष्ट्रीय संबंध और कूटनीति विषयों के छात्र के तौर पर प्रवेश भी लिया।
- 1950: मीरा बेन के साथ फिर कार्य शुरू कर ऋषिकेश के पास बापूग्राम नामक सहकारी गांव की स्थापना की।
- 1954: अपेक्षित परिणाम न मिलने पर बापू ग्राम छोड़ दिया और लंदन में अपने परिवार के पास चले गए। यहां पीस न्यूज के लिए कार्य किया। 1957 में भारत लौटे।
- 1958 से 1964 तक ग्रामीण विकास के लिए काम करने वाली संस्था 'एसोसिएशन ऑफ वॉलंटरी एजेंसीज फॉर रूरल डेवलपमेंट' (AVARD) के महासचिव रहे।
- 1963 से 1965 तक 'ऑल इंडिया पंचायत परिषद' में अध्ययन और अनुसंधान निदेशक रहे।
- 1972–1973 एएन सिन्हा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज पटना सीनियर फेलो, 1985 में 'पैट्रियोटिक एंड पीपल-ओरिएंटेड साइंस एंड टेक्नोलॉजी' (PPST) फाउंडेशन के अध्यक्ष, 1987 में उन्हें भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद (ICHR) के सदस्य, 1991, 1999 से 2001 के बीच भी इस परिषद के सदस्य रहे।
- 1990 में चेन्नई स्थित 'सेंटर फॉर पॉलिसी स्टडीज' में डिस्टिंग्विश्ड फेलो रहे। वर्ष 2001 में भारत सरकार ने उन्हें 'राष्ट्रीय पशु आयोग' (नेशनल कमीशन ऑन कैटल) का अध्यक्ष नियुक्त किया।
वर्ष 1981 से धर्मपाल सेवाग्राम आश्रम वर्धा में रहने लगे थे। 24 अक्टूबर 2006 को उन्होंने सेवाग्राम में ही अंतिम सांस ली।
