वकील बनकर पर्दे पर 'दलील' करना चाहती हैं दीपिका चिखलिया, जागरण फिल्म फेस्टिवल में दिल का 'दर्द' भी किया बयां
Jagran Film Festival: मेरठ में जागरण फिल्म फेस्टिवल के संवाद सत्र में अभिनेत्री दीपिका चिखलिया ने रानी लक्ष्मीबाई और वकील जैसे नए किरदार निभाने की इच्छा जताई।

मेरठ में जागरण फिल्म फेस्टिवल के संवाद सत्र में अभिनेत्री दीपिका चिखलिया से वार्ता करते दैनिक जागरण के संपादकीय प्रभारी रवि प्रकाश तिवारी।
HighLights
अभिनेत्री दीपिका चिखलिया बोलीं, सीता के पात्र में इतना डूब गईं कि अवगुण की जगह नहीं रही।
जब प्रोड्यूसर बनीं तब भगवान राम ने अयोध्या बुलाया, व्यक्तिगत जीवन के लिए राजनीति छोड़ी।
जागरण संवाददाता, मेरठ। 'लोगों को लगता है मैंने रामायण में सीता के अलावा कोई अभिनय किया ही नहीं है...जबकि मैंने उससे पहले और उसके बाद बहुत सारा काम किया है।
दक्षिण भारत की लगभग हर भाषा में फिल्में कर चुकी हूं... अब रानी लक्ष्मीबाई का किरदार निभाने और पर्दे पर वकील बनकर दलील करने की तमन्ना है...।' लोकप्रिय अभिनेत्री दीपिका चिखलिया जब जागरण फिल्म फेस्टिवल के संवाद सत्र में खास मेहमान बनीं तो उनके दिल से यह दर्द उभरा।
लोकप्रिय अभिनेत्री दीपिका चिखलिया जब जागरण फिल्म फेस्टिवल के संवाद सत्र में खास मेहमान बनीं तो उनके दिल से यह दर्द उभरा कि लोग सोचते हैं कि मैंने सीता के अलावा कोई किरदार निभाया ही नहीं। इतना कहते ही बोल पड़ीं...मानों सामने बैठे दर्शकों को भी अधिक नहीं पता...बोलीं मैंने तो बहुत सारा काम किया है।
माडरेटर का आभार जताती हैं कि आपने बहुत अच्छा और जरूरी सवाल किया है। कभी-कभी कोई कलाकार किसी किरदार को निभाता है और फिर वह किरदार धीरे-धीरे कलाकार की पहचान बन जाता है। पर्दा गिर जाता है, कैमरा बंद हो जाता है, कहानी समाप्त हो जाती है लेकिन किरदार दर्शकों के मन में जीवित रहता है।
दीपिका चिखलिया के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। उनके अभिनय सफर में दर्ज दर्जनों फिल्मों और धारावाहिकों के बीच एक नाम सबसे ज्यादा चमकता है सीता। बोलीं, अब तो वह इस पात्र में इतनी डूब गई हैं कि उनमें किसी अवगुण की जगह ही नहीं बची।
'मुझे मेरी सीता मिल गई'
सीता के पात्र के बारे में बताती हैं कि उनकी भेंट रामानंद सागर से हुई। दीपिका उन्हें सम्मान से पापा जी कहती थीं। सीता के लिए आडिशन देते-देते जब थक गईं तो उनकी वेशभूषा बदली गई। जेवर पहनाए गए। उन्हें लंबे संवाद दिए गए और फिर स्पाटलाइट के सामने खड़ा कर दिया गया। वह दृश्य भावनाओं से भरा था।
दीपिका की आंखों में आंसू थे। कैमरा चल रहा था। संवाद बोले जा रहे थे लेकिन शायद उस क्षण अभिनय और वास्तविक भावनाओं के बीच की रेखा बहुत धुंधली हो गई थी। दृश्य समाप्त हुआ और रामानंद सागर ने वह बात कह दी जो आगे चलकर भारतीय टेलीविजन के इतिहास का हिस्सा बन गई 'मुझे मेरी सीता मिल गई'।
भ्रमित कर सकते हैं नई रामायणों के नए काेण
रामायण के नए संस्करणों और बार-बार किए जा रहे बदलावों को लेकर दीपिका की अपनी स्पष्ट राय है। उनका मानना है कि रामायण को बार-बार नए कोणों और नए प्रसंगों के साथ प्रस्तुत करने से मूल कथा को लेकर आने वाली पीढ़ियों में भ्रम पैदा हो सकता है।
वह चाहती हैं कि रामायण पर फिल्म या धारावाहिक जरूर बनाए जाएं, लेकिन मूल कथा और उसके मूल स्वरूप का सम्मान बना रहे।
