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मॉस्को से मेरठ तक! CCSU में बजा 'कालिंका' का डंका; संगीत ने मिटाई भाषा और देशों की दूरी

By Amit Tiwari Edited By: Praveen Vashishtha
Published: Thu, 01 Oct 2026 04:53 PM (IST)

मेरठ के चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय में 'रशियन कल्चरल आर्नामेंट्स' के समापन समारोह में भारत और रूस की संस्कृतियों का ...और पढ़ें

चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय में प्रस्तुति देते रूस के कलाकार। जागरण

 चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय में प्रस्तुति देते रूस के कलाकार। जागरण

HighLights

  1. ‘रशियन कल्चरल आर्नामेंट्स’ के समापन में लोकगीत, नृत्य और पारंपरिक वाद्ययंत्रों ने बांधा समां।

  2. चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय  के छात्रों ने भी रूसी कलाकारों संग लोकधुनों पर नृत्य किया।

जागरण संवाददाता, मेरठ। चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय का परिसर गुरुवार को रूस के रंग में रंगा नजर आया। मंच से निकली रूसी लोकधुनों ने माहौल में ऐसी मिठास घोली कि मेरठ के विद्यार्थी भी उनकी लय पर कदम मिलाने लगे। कहीं तेज रफ्तार लोकनृत्य में रूसी परंपरा की जीवंतता दिखाई दी तो कहीं मातृभूमि, प्रकृति और मानवीय भावनाओं से जुड़े गीतों ने दर्शकों को भावविभोर कर दिया।

‘रशियन कल्चरल आर्नामेंट्स’ के समापन समारोह में भारत और रूस की संस्कृतियों का यह खूबसूरत मिलन देर तक याद रहने वाला दृश्य बना।  कार्यक्रम की शुरुआत ‘बारीश्नी इ खुलिगान’ से हुई। रूसी शब्द ‘बारीश्नी’ का अर्थ ‘युवतियां’ और ‘खुलिगान’ का अर्थ ‘शरारती युवक’ है। चंचलता, हास्य और युवा उमंग से सजी इस प्रस्तुति ने शुरुआत से ही दर्शकों को अपने रंग में बांध लिया।

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इसके बाद मंच पर गूंजा ‘मातुश्का रस्सिया’, यानी ‘मां रूस’। रूसी संस्कृति में अपनी मातृभूमि को ‘मां’ के रूप में संबोधित करने की भावनात्मक परंपरा इस प्रस्तुति में साफ दिखाई दी। गीत में अपनी मिट्टी, अपनी जड़ों और मातृभूमि के प्रति प्रेम की अनुभूति थी। सभागार में मौजूद भारतीय विद्यार्थियों ने भी इस भाव से सहज जुड़ाव महसूस किया।

‘मास्कवा’ से ‘कालिंका’ तक दिखी रूसी संस्कृति की रंगीन तस्वीर

‘मास्कवा ज्लाताग्लावाया’ यानी ‘स्वर्णिम गुंबदों वाला मास्को’ ने दर्शकों को रूस की ऐतिहासिक राजधानी की सांस्कृतिक भव्यता से परिचित कराया। इसके बाद ‘शुतोच्नी’, जिसका अर्थ ‘हास्यपूर्ण या मजाकिया’ है, ने माहौल को ठहाकों और उल्लास से भर दिया।

‘रुस्स्किये सपोज्की’ यानी ‘रूसी जूते यानी बूट्स’ की प्रस्तुति में पारंपरिक पहनावे और लोकनृत्य की आकर्षक छटा देखने को मिली। कलाकारों के कदमों की सटीक ताल और संगीत की लय ने प्रस्तुति को खास बना दिया। इसके बाद ‘या लेचू नाद रस्सिये’ यानी ‘मैं रूस के ऊपर उड़ रहा हूं’ ने रूस की विशाल धरती, प्राकृतिक सौंदर्य और विस्तृत भू-दृश्यों की सांगीतिक झलक दिखाई।

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फिर जैसे ही ‘कालिंका’ की मशहूर धुन बजी, पूरा सभागार तालियों से गूंज उठा। रूसी लोकसंगीत की यह लोकप्रिय रचना अपनी तेज लय और उत्साहपूर्ण प्रस्तुति के लिए दुनिया भर में जानी जाती है। कलाकारों की फुर्ती और नृत्य की गति ने माहौल को चरम पर पहुंचा दिया।

वोल्गा की लहरों से ग्रामीण जीवन तक

दूसरे ब्लाक में ‘बारिन्या’ से शुरुआत हुई। ‘बारिन्या’ रूसी लोकनृत्य की प्रसिद्ध शैली है, जिसमें तेज कदम, ऊर्जावान मुद्राएं और सामूहिक लय इसकी खास पहचान हैं।

इसके बाद ‘व्निज पो वोल्गे रेके’ यानी ‘वोल्गा नदी की धारा के साथ’ ने रूसी लोकजीवन की एक अलग तस्वीर सामने रखी। रूस की विशाल वोल्गा नदी इतिहास, साहित्य, संगीत और लोकपरंपराओं से गहराई से जुड़ी है।

‘आ या पो लुगु’ यानी ‘और मैं घास के मैदान में’ में प्रकृति और ग्रामीण जीवन का रंग दिखा। वहीं ‘पोद ओक्नोम शिरोकिम’ यानी ‘चौड़ी खिड़की के नीचे’ ने पारंपरिक रूसी घरों, परिवार और मानवीय संबंधों की भावनात्मक दुनिया से परिचित कराया।

‘देविची पेरेप्ल्यास’ यानी ‘युवतियों का पारंपरिक नृत्य’ में कलाकारों के सामूहिक तालमेल और नृत्य कौशल ने दर्शकों को खूब प्रभावित किया।

संगीत ने मिटाई भाषा की दूरी

‘झिव्योत माया अत्रादा’ यानी ‘मेरी खुशी जीवित है’ ने कार्यक्रम को भावनात्मक गहराई दी। प्रेम, लगाव और मानवीय संवेदनाओं से जुड़े इस लोकगीत ने यह अहसास कराया कि संगीत की कोई सीमा नहीं होती। भाषा अलग होने के बावजूद भावनाएं सीधे दिल तक पहुंचती हैं।

समारोह में भारतीय विद्यार्थियों के लिए रूस के पारंपरिक संगीत वाद्ययंत्रों का परिचय भी विशेष आकर्षण रहा। विद्यार्थियों ने वाद्ययंत्रों की बनावट, उनकी ध्वनि और रूसी लोकसंगीत में उनकी भूमिका के बारे में जानकारी ली। इससे कार्यक्रम महज सांस्कृतिक प्रस्तुति न रहकर विद्यार्थियों के लिए सीखने और दूसरी संस्कृति को करीब से समझने का अवसर भी बन गया।

रूसी धुनों पर थिरके मेरठ के विद्यार्थी

समापन समारोह में सबसे मनमोहक दृश्य तब बना, जब मेरठ के विद्यार्थियों ने रूसी कलाकारों के साथ रूसी संगीत पर नृत्य किया। भारतीय युवाओं के कदम जब रूसी लोकधुनों की ताल से मिले तो मंच पर संस्कृतियों की अद्भुत जुगलबंदी नजर आई। अंतिम प्रस्तुति ‘नाश क्राय रस्सिया’ यानी ‘हमारी धरती, रूस’ के साथ सांस्कृतिक यात्रा का भावपूर्ण समापन हुआ। गीत में अपनी धरती के प्रति प्रेम, अपनत्व और गर्व की अनुभूति थी।

रशियन कल्चरल आर्नामेंट्स का यह समापन समारोह केवल गीत-संगीत और नृत्य का आयोजन नहीं रहा। इसने सीसीएसयू परिसर में भारत और रूस के बीच सांस्कृतिक संवाद की एक जीवंत तस्वीर पेश की। रूसी लोकधुनों पर थिरकते मेरठ के युवा और रूसी कलाकारों के साथ उनका सहज संवाद इस बात का प्रमाण बना कि संस्कृतियां अलग हो सकती हैं, लेकिन संगीत, कला और मानवीय भावनाएं लोगों को एक-दूसरे के बेहद करीब ला सकती हैं।