मेरठ, [प्रदीप द्विवेदी]। बसपा के पार्षद धर्मवीर के सितारे बुलंदी पर आकर चमकने को बेताब हैं। मायावती के जन्मदिन के कार्यक्रम में पूर्व मंत्री याकूब कुरैशी के बगल में बैठने का मौका पाए तो सपना दिन-दूनी रात चौगुनी की तरह उसी समय देखने लगे। लगे हाथ मंच पर जनाब की शान में कसीदे भी पढ़ दिए। यह कसीदे एक समीकरण के तहत साहब पढ़ रहे थे। यह मौका हाथ लगा है योगेश वर्मा के पार्टी से निकाले जाने से। योगेश वर्मा और महापौर जब बसपा से निष्कासित हुए तो पार्षद साहब के नसीब जाग गए। बसपा ने उन्हें पार्षद दल का नेता बना दिया। विचार से भी बसपा की राजनीति में फिट बैठते हैं और भारी जेब वाले हैं। सो इस बार मंच की अग्रिम पंक्ति में ही नहीं बैठाए गए बल्कि विशिष्ट अतिथि से भी नवाजा गया। अब सपना है कि योगेश वाली पसंदीदा सीट हस्तिनापुर में याकूब उनकी मदद कर दें।

अपनी भी साइकिल निकालो

सपना संगठन चलाने का है, इसलिए साइकिल वाली पार्टी में अब सब कुछ साफ और स्पष्ट हो चुका है। मौजूदा वक्त में तीन धड़े खुलकर सामने आ गए हैं। एक है गोपाल, जयवीर व गुलाम मोहम्मद वाला। जिनमें बाबर व सम्राट मलिक युवराज की तरह हैं। दूसरा है राजपाल, शहर विधायक रफीक अंसारी का, जिसमें आदिल चौधरी भी दिखते हैं। तीसरा है अतुल प्रधान का धड़ा। खैर अतुल का सिद्धांत एकला चलो वाला है। जो साथ आ जाए वो अपना वरना गिला नहीं। ये धड़े एक-दूसरे पर नजर भी रखते हैं। कौन- कहां पहुंच रहा है। इस बात की होड़ है कि सबसे पहले वही पहुंचें। ज्यादा दिखने और ज्यादा एक्टिव होने का ठप्पा लगवाना है। इसलिए जब एक साइकिल निकालता है तो हल्ला मच जाता है कि अपनी भी निकालो। वैसे तो तीनों अलग-अलग रहते हैं, लेकिन मतलब वाला आयोजन दूसरे का हो तो अपनापन दिखाई दे जाता है।

ब्रेकेट में डिप्टी कलक्टर

सपना बेचने वाले प्राधिकरण में तहसीलदार मनोज सिंह का सपना पूरा नहीं हो पा रहा है। मुराद पूरी हुई तो डिप्टी कलक्टर की पदोन्नति पा गए। चेहरा खुश हुआ। ओहदा बढऩे का अहसास अपने आप आ गया। बिना देरी किए कार्यालय के बाहर नेम प्लेट टांग दी गई डिप्टी कलक्टर साहब की। शागिर्द खुश करने में लग गए कि साहब एसडीएम बन जाओगे अब तो। पता नहीं किसकी काली जुबान से ये निकला था। कई महीने हो गए साहब का तबादला ही नहीं हुआ। सपना अटका हुआ है। इस खुशी का कइयों को वह मिठाई भी नहीं बांट पाए हैं। कभी भाग्य को भी कोसते हैं कि कब होगा और सपना भी देखते हैं। खैर, सपना देखना अच्छी बात है और वह उस सपने को जी भी रहे हैं। काम भले ही उस स्तर का नहीं है अब, लेकिन फाइलों में ब्रेकेट में डिप्टी कलक्टर लिखकर जी बहला रहे हैं।

और गोपनीय हुए गोर्की

मेरठ विकास प्राधिकरण में सहायक नगर नियोजक गोर्की कौशिक अब पहले से भी ज्यादा गोपनीय हो गए हैं। जो कार्यालय कभी मेट्रो ट्रेन के लिए खोला गया था उसे चुना था। शानदार कार्यालय बना ही था। फाइलें अक्सर उनके पास से लौटती रहती हैं, इसलिए बिल्डरों से अदावत भी यदा-कदा होती रहती थी। तमाम महत्वपूर्ण फाइलें उनके पास जाती हैं। वैसे तो अब मुख्य नगर नियोजक और नगर नियोजक की कुर्सी पर नियुक्ति हो चुकी है, लेकिन उनके पास काम कम नहीं हुआ है। वैसे तो लोग उनके पास जाने से पहले ही कतराते थे, अब तो उन्होंने केबिन भी बनवा ली है बाकायदा। इस तरह से एक ही कार्यालय के अंदर अब तीन केबिन हो गई हैं। वह तीनों में बैठे मिल सकते हैं। यह फाइल पर निर्भर करता है कि चर्चा किस केबिन में होनी है। उम्मीद है कि गोपनीय कक्ष से शहर के लिए कुछ अच्छा मिलेगा। 

Posted By: Taruna Tayal

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