Asian Games 2026: एशियाड में 'अफ्रीकी कनेक्शन' ने प्राची और पारुल को बड़ी कामयाबी से रोका? एक नियम को लेकर उठा सवाल
Asian Games 2026: एशियाई खेलों में अफ्रीकी मूल के एथलीट नागरिकता के एक नियम के तहत हिस्सा ले रहे हैं। ...और पढ़ें

महिलाओं की 400 मीटर दौड़ की स्वर्ण विजेता अफ्रीकी मूल की एथलीट बहरीन की सलवा नासेर के साथ कांस्य पदक विजेता प्राची चौधरी और इंसेट में पारुल चौधरी। सौ. सोशल मीडिया
HighLights
पारुल और प्राची चौधरी ने एशियाई खेलों में कांस्य पदक जीते।
अफ्रीकी मूल के एथलीटों का बढ़ रहा है एशियाई खेलों में दबदबा।
प्रवीण वशिष्ठ, मेरठ। आइची-नागोया एशियाड 2026 में मेरठ की पारुल चौधरी और सहारनपुर की प्राची चौधरी ने अपनी-अपनी इवेंट में कांस्य मेडल जीतकर देश का मान बढ़ाया है। यदि अफ्रीकन कनेक्शन आड़े न आता तो दोनों एथलीटों के मेडल का रंग बदल सकता था।
दरअसल पिछले दो-तीन एशियाई खेलों में अफ्रीकी मूल के एथलीटों का दबदबा बढ़ा, इसका कारण कुछ देशों का उन्हें नागरिकता देकर अपनी टीम से मैदान में उतार देना है, हालांकि इस नियम की समय-समय पर आलोचना भी होती रही है।
ओलिंपियन धाविका पारुल चौधरी ने एशियाई खेलों में रविवार को महिलाओं की 3000 मीटर स्टीपलचेज के फाइनल में उन्होंने कांस्य पदक जीता। उनकी इवेंट में बहरीन की विनफ्रेड यावी ने स्वर्ण और कजाकिस्तान की नोरा जेरुटो तानुई ने रजत पदक जीता। दोनों मूल रूप से केन्या की निवासी हैं।
इससे पहले महिलाओं की 400 मीटर दौड़ का स्वर्ण बहरीन की सलवा नासेर ने जीता। इस स्पर्धा का कांस्य प्रीति चौधरी को मिला। खास बात यह है कि नासेर का जन्म नाइजीरिया में हुआ था और उन्होंने बहरीन की नागरिकता लेकर उसका प्रतिनिधित्व करना शुरू किया।
मेरठ की पारुल चौधरी ने महिलाओं की 1500 मीटर दौड़ में भी हिस्सा लिया था और वह मेडल से सिर्फ एक कदम दूर यानि चौथे स्थान पर रहीं। इसमें गोल्ड बहरीन की खिलाड़ी नेली कोरिर ने जीता। वह केन्या की मूल निवासी हैं।
बात केवल प्राची और पारुल की स्पर्धाओं तक सीमित नहीं है। वर्तमान एशियाड की कई एथलेटिक स्पर्धाओं में अफ्रीकी मूल के एथलीट मेडल जीतने में एशियाई देशों के मूल नागरिक खिलाड़ियों को पीछे छोड़ रहे हैं।
खास बात यह है कि बहरीन, कतर और अन्य कुछ जैसे देशों ने करीब ढाई दशक पहले केन्या, इथियोपिया और नाइजीरिया जैसे अफ्रीकी देशों में जन्मे खिलाड़ियों को नागरिकता देकर अपनी एथलेटिक्स टीम मजबूत की। आज बहरीन के लगभग सभी धावक और धाविकाएं अफ्रीकी मूल के हैं।
सवाल केवल भारतीय एथलीटों का नहीं है, इस मुद्दे की आलोचना करने वालों का कहना है कि यह एशियाई खेलों में सही मायने में एशिया का प्रतिनिधित्व नहीं है।
क्या है नियम ?
दरअसल, OCA (Olympic Council of Asia ) के नियम विदेशी मूल के खिलाड़ियों को एशियाड में खेलने की अनुमति देते हैं। इसमें कई शर्तें हैं, जिनमें मुख्य शर्त यह है कि यदि खिलाड़ी एशिया के बाहर पैदा हुआ है, तो उसे उस देश का नागरिक बनने के साथ वहां लगातार कम से कम तीन वर्ष निवास करना होगा।
भारत जता चुका है आपत्ति
भारत ने एशिया के बाहर के अन्य देशों के खिलाडियों को लेकर इस नीति पर आपत्ति जताई थी। उनकी मांग रही है कि केवल एशियाई मूल के खिलाड़ियों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए नियमों की समीक्षा की जानी चाहिए। भारतीय एथलेटिक्स महासंघ के तत्कालीन अध्यक्ष और ओलिंपियन आदिल सुमारिवाला इसकी कड़ी आलोचना की थी। उनका कहना था कि यह एशियाई खेलों की मूल भावना के विपरीत है।
ये बोले, पूर्व इंटरनेशनल मेडलिस्ट और कोच
नियम की हो समीक्षा: सतीश यादव

मेरठ के कैलाश प्रकाश स्पोर्ट्स स्टेडियम में बॉक्सिंग कोच अर्जुन अवार्डी सतीश यादव ने 2014 के एशियाई खेलों में कांस्य और वर्ष 2018 के कामनवेल्थ गेम्स में रजत पदक जीता था। 2020 टोकियो ओलिंपिक में सुपर हैवीवेट वर्ग में देश का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। इस वर्ग में देश के लिए ओलिंपिक में खेलने वाले अकेले बॉक्सर हैं।
वह एक किस्सा बताते हुए कहते हैं कि 2018 के आसपास एक अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में पहली बार उन्हें पता चला कि बहरीन के दल में रूसी मूल का एक बॉक्सर भी है।
उनके विचार में मात्र तीन साल नागरिकता के पूरे कर सम्बन्धित देश के लिए खेलने वाले नियम की समीक्षा होनी चाहिए। संबंधित पक्षों को विदेशी मूल के खिलाड़ियों की अन्य देश के लिए खेलने के नियम अधिक कड़े करने चाहिए।
तो क्या हम भी अफ्रीका से एथलीट और क्यूबा से बॉक्सर ले आएं: संदीप पुंडीर

सहारनपुर निवासी कोच संदीप पुंडीर वर्तमान में भोपाल में अपनी एथलेटिक्स अकादमी चला रहे हैं। कुछ वर्ष पहले तक सहारनपुर में ही खिलाड़ियों को प्रशिक्षण दे रहे थे। उनसे प्रशिक्षण लेने वाले कई एथलीट अंतराष्ट्रीय स्तर पर चमके हैं।
वह बताते हैं कि करियर के शुरू में प्राची चौधरी सहारनपुर के स्टेडियम में करीब 6 माह उनकी प्रशिक्षु रही थीं। तभी उन्हें उस खिलाड़ी के अंदर प्रतिभा दिखाई थी। आज भी प्राची समय-समय पर उनसे परामर्श करती हैं।
संदीप पुंडीर इस नियम की कड़े शब्दों में आलोचना करते हैं। व्यंग्य में कहते हैं कि ऐसे में तो हमारी सरकार को देश के खिलाड़ियों पर सैकड़ों-हजारों करोड़ रुपए खर्च करने की जगह अफ्रीका से एथलीट और क्यूबा से मुक्केबाज लाकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक बटोरने शुरू कर देने चाहिए।
कहते हैं कि यह नियम नहीं मजाक है, कुछ साल पहले तक एक ही देश से खेल रहे खिलाड़ी दो अलग-अलग देशों का प्रतिनिधित्व करने लगते हैं। पारुल चौधरी से आगे रहने वाली केन्या की मूल निवासी एथलीटों को इसका सबसे ताजा उदाहरण बताते हैं। एशियाई खेल केवल और केवल इसी महाद्वीप में जन्में खिलाड़ियों के लिए होने चाहिए।
किसी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में पदक विजेता पूरे राष्ट्र का गौरव होता है, तीन साल पहले नागरिकता लेने वाले से शायद उस देश के नागरिक भी उतना जुड़ाव महसूस नहीं करते होंगे। कहते हैं कि हमारे खिलाड़ी किसी से कम नहीं हैं, लेकिन प्रतिभा की पहचान कर उसकी समय पर ट्रेनिंग शुरू करना बहुत जरूरी है।
नियम पर हो पुनर्विचार: गौरव त्यागी
मेरठ स्पोर्ट्स स्टेडियम में एथलेटिक्स कोच गौरव त्यागी पारुल के करियर की शुरुआत में इस स्टेडियम में उनके कोच रह चुके हैं। पारुल की सफलता पर वह बहुत खुश हैं। उनका कहना है कि वर्ष 1900 के ओलिंपिक में ब्रिटिश भारत के लिए पदक जीतने वाले नॉर्मन पिचर्ड को ब्रिटेन के कई खेल इतिहासकार और खेलों से जुड़े लोग अपना बताते रहे हैं, जबकि 1928 से देश के आजाद होने तक हॉकी में जीते पदकों पर कोई विवाद नहीं है। नागरिकता के तीन साल वाले नियम पर पुनर्विचार होना चाहिए। इसे आपकी निजी राय बताते हुए कहते हैं कि कम से कम एशियाई स्तर पर इसी महाद्वीप में जन्में एथलीट को मौका मिले तो बेहतर है।
नियम सबके लिए बराबर है: विशाल सक्सेना

कोच विशाल सक्सेना इस नियम में कोई बुराई नहीं देखते, क्योंकि यह सब देशों के लिए समान है। उनका मानना है अफ्रीकी एथलीटों के आने से एशिया में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और अन्य देशों के खिलाड़ी अच्छा प्रदर्शन करने में सफल रहेंगे।
