जागरण संवाददाता, घोसी (मऊ) : खेती के साथ अनिवार्य रूप से जुड़े पशुपालन में आई कमी ने खेतों की उर्वरा शक्ति को क्षीण कर दिया है। रासायनिक उर्वरकों के अंधाधुंध प्रयोग के बीच गोबर एवं कंपोस्ट खाद की शून्य मात्रा के कारण खेतों में जीवाश्म की मात्रा घटकर 0.2 ग्राम के खतरनाक स्तर पर पहुंच गई है। यदि किसान न चेते तो वह दिन दूर नहीं जब खेत बांझ हो जाएंगे।

दरअसल जिले के किसानों के खेत से लिए गए मृदा नमूने के परीक्षण के दौरान यह खतरनाक एवं हानिकारक तथ्य सामने आया है। जनपद के खेतों में जीवांश कार्बन की मात्रा मानक 0.8 फीसदी से घटकर 0.2 तक जा पहुंची है। इस बाबत कृषि उपनिदेशक एसपी श्रीवास्तव बताते हैं कि मृदा में जीवांश कार्बन की मात्रा कम होने से सूक्ष्मजीव कम होते हैं। जबकि इन सूक्ष्म जीवों की उपस्थिति में ही रासायनिक उर्वरक के सभी तत्व पौधों तक नहीं पहुंच पाते हैं। इसका खुलासा करते हुए कृषि उपनिदेशक बताते हैं कि उर्वरक में विद्यमान तत्व रासायनिक यौगिक के रूप में होते हैं। पौधों तक पहुंचने के लिए इनका आयन होना आवश्यक है। आयन रूपांतरण हेतु सूक्ष्मजीवी की उपस्थिति अनिवार्य है। सूक्ष्म जीवों की मात्रा कम होने पर खेत में पौधों की वृद्धि एवं दानों के सुडौल होने के लिए डाले जाने वाले रासायनिक उर्वरक में शामिल तत्व पानी के साथ मिलकर जमीन में चले जाते हैं या फिर वायुमंडल अवशोषित कर लेता है। पानी के साथ जमीन में जाकर यह तत्व जल प्रदूषण का कारक भी बनते हैं। एक अन्य तथ्य यह कि मिट्टी में जीवांश कार्बन की मात्रा कम होने पर फास्फेटिक उर्वरक अघुलनशील यौगिक में तब्दील हो जाते हैं। वर्जन--

पराली को खेम में जलाने से महज पर्यावरण ही प्रदूषित नहीं होता है वरन मिट्टी की प्रकृति बदलती है। सबसे बड़ी नुकसान यह कि किसान जीवाश्म से परिपूर्ण पराली को जला देता है। पराली में विभिन्न कार्बनिक तत्व होते हैं। इसकी कंपोस्ट खाद बनाकर खेत में छिड़काव करने से खेत की माटी में जीवाश्म प्रतिशत को बढ़ाएं।-एसपी श्रीवास्तव, कृषि उपनिदेशक।

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