जागरण संवाददाता, घोसी (मऊ) : वसंत पंचमी बीत गई। अ्रगेजी कैलेंडर का महीना भी बदल गया। अभी तक गांवों में न ढोलक की थाप सुनाई दे रही है ना फाग। परंपरा के अनुसार वसंत पंचमी के ही दिन होलिका दहन स्थल पर पूजन कर सुपारी एवं अन्न जमीन में गाड़ा जाता है। इस स्थल पर गांव के युवक प्रतिदिन होलिका दहन हेतु लकड़ी एवं पुआल सहित अन्य सामग्री एकत्रित करना प्रारंभ कर देते हैं।

भारतीय परंपरा के अनुसार वसंत पंचमी के दिन से वसंत की अंगड़ाई को निबद्ध किए गीत गवनई का दौर प्रारंभ होता है तो बदलते मौसम के साथ गीत के बोल बदलते रहते हैं। यह क्रम गेहूं की फसल काट कर चैत माह में खलिहान से घर आने की खुशी को चैता के रूप में प्रकट करने तक जारी रहता है। वसंत पंचमी (एक फरवरी) के पर्व की सूचना अब चौपाल से उठते चौताल और फाग के बीच ढोलक के सुर नहीं देते हैं। यह सूचना अब कैलेंडर ही देता है या फिर सवारी वाहनों, ट्रकों और ट्रैक्टर से गूंजते अश्लील होली गीत ही देते हैं। अब तो ग्रामीण क्षेत्र हो या नगरीय सर्वत्र बस यही प्रतीत होता है कि'बिसर गईल फाग भूला गईल चैता।'

भारतीय शास्त्रीय एवं पारंपरिक गीत प्रत्येक मास, ऋतु, वेला एवं आयोजन के लिए पृथक-पृथक हैं। इनकी धुन अलग है तो भाव बेहद गूढ़। वसंत पंचमी के दिन होलिका स्थापना की परंपरा के साथ ही'चहका'के अनिवार्य गायन से फाग या फगुआ का शुभारंभ हो जाता है। पुरुष'आईल वसंती बहार बोलो सारा रारा'तो महिलाएं वसंत के मौसम में केदली खिलने की सूचना यूं देती हैं'कवने बनवां मोरवा बोले सखी, केदली बने मोरवा बोले सखी'। दोनों ही वर्ग'अंखिया लाले लाल एक नींद सोवे द बलमुवा'गाते हैं। बहरहाल वसंत पंचमी के दिन से चहका के बाद फाग गाए जाने की ही नहीं वरन इस दिन होलिका की स्थापना की परंपरा अब विलुप्त होती जा रही है। एक दशक पूर्व तक परंपरा यह कि वसंत पंचमी के बाद पूरे फाल्गुन मास में प्रतिदिन या सप्ताह में एक दिन ग्रामीण एकत्रित होकर ताल निबद्ध शास्त्रीय गीत चौताल गाते थे। द्विगुण और चौगुण में चौताल गाए जाने की परंपरा अब चंद स्थानों तक सिमटी है। चौताल में भाव प्रधान और कुप्रथा पर प्रहार करने वाले'जेकरे घरे कन्या कुंवारी नींद कइसे आई'सरीखे गीतों की बानगी ही अलग है। फाल्गुन मास के बीतते ही चैत मास में'रोज-रोज बोल कोइलर संझवां बिहनवां, आज काहें बोल आधी रतिया हो रामा'सरीखे वेदना समेटे गीत प्रमुखता से गाए जाते हैं हालांकि तमाम कथानक आधारित गीतों का भी समावेश है। पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही इन गीतों की परंपरा को कायम रखने वाले ग्रामीण कहीं प्रशिक्षण नहीं लेते थे। बस युवावस्था में ही बुजुर्गो संग संगत कर पारंगत होते थे। अब युवा विमुख हुआ तो परंपरा विलुप्त हो रही है।

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बुजुर्ग एवं युवा आगे आएं-प्रमोद

घोसी : प्रदेश लोक कला प्रमुख प्रमोद राय प्रेमी कहते हैं कि युवा इन पारंपरिक गीतों को सीखने और बुजुर्ग सिखाने को आगे आएं। आज होली गीत के नाम पर अश्लीलता परोसी जा रही है। लोक परंपराओं और इनसे जुडे़ विभिन्न रस और भाव आधारित गीतों को कायम रखने की पहल आवश्यक है।

Posted By: Jagran

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