मऊ : बटेर पक्षी का नाम सुनते ही मांस खाने वालों के मुंह में पानी आ जाता है। इसके मांस के लिए लोग पैसों की परवाह नहीं करते। मांस व अंडा उत्पादन के क्षेत्र में भी बटेर पालन कर बहुत लाभ कमाया जा सकता है। जापानी नस्लों के विकास के साथ ही बटेर पालन अब व्यवसाय के रूप में देश के कई हिस्सों में तेजी से फैल रहा है। अपार संभावनाओं से भरे पूर्वाचल में व्यवसाय के रूप में इसका विकास होना अभी बाकी है।

स्वादिष्ट मांस के रूप में बटेर को बड़े ही चाव से पसंद किया जाता है। इस दिशा में ढाई दशक के लंबे प्रयास के बाद बटेर के इस पालतू प्रजाति का विकास मांस व अंडा उत्पादन के लिए किया गया है। बटेर पालन के लिए मुख्य रूप से फराओ, इग्लिस सफेद, कैरी उत्तम, कैरी उज्जवल, कैरी श्वेता, कैरी पर्ल व कैरी ब्राउन की जापानी नस्लें हैं। शीघ्र बढ़वार, अधिक अंडे उत्पादन, प्रस्फुटन में कम दिन सहित तत्कालिक वृद्धि के कारण यह व्यवसाय का रूप तेजी से पकड़ता जा रहा है।

वर्ष भर के अंतराल में ही मांस के लिए बटेर की 8-10 उत्पादन ले सकते हैं। चूजे 6 से 7 सप्ताह में ही अंडे देने लगते हैं। मादा प्रतिवर्ष 250 से 300 अंडे देती है। 80 प्रतिशत से अधिक अंडा उत्पादन 9-10 सप्ताह में ही शुरू हो जाता है। इसके चूजे बाजार में बेचने के लिए चार से पांच सप्ताह में ही तैयार हो जाते हैं। एक मुर्गी रखने के स्थान में ही 10 बटेर के बच्चे रखे जा सकते हैं। इसके साथ ही रोग प्रतिरोधक होने के चलते इनकी मृत्यु भी कम होती है। इन सबसे महत्वपूर्ण यह है कि बटेर को किसी भी प्रकार के रोग निरोधक टीका लगाने की जरूरत नहीं होती है। एक किलोग्राम बटेर का मांस उत्पादन करने के लिए दो से ढाई किलोग्राम राशन की आवश्यकता होती है। बटेर के अंडे का भार उसके शरीर का ठीक आठ प्रतिशत होता है जबकि मुर्गी व टर्की के तीन से एक प्रतिशत ही होता है।

कृषि विज्ञान केंद्र पिलखी के वरिष्ठ वैज्ञानिक डा.वीके सिंह बताते हैं कि विदेशों में बटेर उत्पादन एक विकसित व्यवसाय का रूप ले चुका है। भारत में इसका विकास धीरे-धीरे हो रहा है। तापमान और वातावरण के हिसाब से पूर्वाचल में इसकी अकूत संभावना है। इसको व्यवसायिक रूप देकर बटेर उत्पादन कर इस दिशा में अच्छी आय कमा सकते हैं।

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